इंदौर: शहर की बंद पड़ी मिल परिसरों को व्यावसायिक विक्रय के लिए सैकड़ों पेड़ों को काटने के सरकारी फैसले पर विरोध तेज हो गया है. साथ ही बड़े आंदोलन की तैयारी भी की जा रही है.पर्यावरण को नष्ट कर नुकसान पहुंचाने का मामला हुकुमचंद मिल क्षेत्र से सामने आया है, जहां वर्षों पहले मिलें संचालित हुआ करती थी जिससे सैकड़ों परिवार पलते थे. दिवालिया होने के बाद शहर की सभी मिलें बंद हो गई.इन मिलों की बेशकीमती जमीन पर सरकार की नजर पड़ चुकी है. अब सरकार मिल के अंदर सैकडों पेड़ों की बलि चढ़ाकर उसका विक्रय करने जा रही है.
इसके बाद क्रैक करने वाली कंपनी को ज़मीन पर व्यवसायिक कॉम्पलेक्स या कॉलोनी काटने की अनुमति मिल जाएगी. वृक्षों की कटाई के फैसले के खिलाफ पिछले तीन वर्ष से स्थानीय समाजसेवियों व पर्यावरण प्रेमियों ने पिछले एक माह से नगर निगम व जिला प्रशासन, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री एवं पर्यावरण विभाग सहित विभिन्न कार्यालयों में आवेदन और ज्ञापन देकर आपत्ति दर्ज कराई है लेकिन अब तक शासन ने अपने निर्णय में कोई बदलाव नहीं किया है. लोगों का कहना है कि मिल परिसर के पेड़ शहर की हरियाली और पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं. उन्होंने सरकार से मांग की है कि कॉलोनी निर्माण से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का पुनः अध्ययन कर पेड़ों को संरक्षित रखने वाला विकल्प अपनाया जाए.
इनका कहना है
चालीस से सौ वर्ष पुराने वयस्क पेड़ काटेंगे जो पर्यावरण वातावरण और मानव के लिए खतरा है. नए पौधे इतनी ऑक्सीजन नहीं बना पाते हैं. अस्सी प्रतिशत पौधे तो नष्ट हो जाते हैं.
– राहुल निहोरे, युवा समाजसेवी
एक तरफ शासन पर्यावरण संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर विकास के नाम पर वर्षों पुराने कीमती पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है. शहर का पर्यावरण संतुलन बनाये रखने हेतु इन्हें बचाना बहुत जरूरी है.
– डॉ. दिलीप वागेला, पर्यावरण विद्
प्राकृतिक हरियाली और पेड़ की बलि देकर हर तरफ कांक्रीट का जंगल विकसित किया जा रहा है. पर्यावरण के साथ जैव विविधता को बचाने के लिए प्रत्येक नागरिक को आगे आकर जागरूक अभियान चलाना चाहिए.
– डॉ. ओ पी जोशी, पूर्व प्राचार्य, गुजराती साइंस कॉलेज
