विश्व स्तरीय भारतीय धावक तैयार करने के लिए और लंबी दूरी की ज्यादा प्रतियोगिताओं की आवश्यकता : रुपिंदर सिंह

नयी दिल्ली, 20 दिसंबर (वार्ता) विश्व स्तरीय भारतीय धावक तैयार करने के लिए अनुशासन के साथ लंबी दूरी की अधिक प्रतियोगिताओं की आवश्यकता है। भारत में लंबी दूरी की दौड़ का आयोजन बहुत कम होता है, जिसके बिना न तो प्रतिभा में निखार आता है और न ही हमारे एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्वयं को साबित करने का आत्मविश्वास मिलता है। इसके लिए भारतीय धावकों को विदेशो में होने वाली दौड़ों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिए।
देश में उद्योग घरानों द्वारा आयोजित मैराथन दौड़ लोकप्रिय हो रही हैं। इन्होंने विदेशी धावकों पर भारी पैसा खर्च करके जरूरी रिसोर्स बर्बाद कर दिया हैं, और भारतीय धावकों के समर्थन के लिए लगभग कोई कदम नहीं उठाया गया है। ऐसी स्थिति में, यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि भारत का मैराथन रिकॉर्ड 1978 में बना था और 47 सालों से अभी तक टूटा नहीं है। जाने माने धावक शिवनाथ सिंह ने 1978 में जालंधर में 2:12:00 के समय के साथ नेशनल रिकॉर्ड बनाया था। महिला वर्ग में, रिकॉर्ड ओपी जैशा ने 2015 विश्व चैंपियनशिप में 2:34:43 के समय के साथ बनाया था। अगर आप 5000 मीटर से आगे के राष्ट्रीय रिकॉर्ड की सूची देखेंगे, तो पायेंगे कि सभी रिकार्ड विदेश में बने है।
अपने रेसिंग करियर का एक बड़ा हिस्सा देश में बिताने के बाद, एथलीटों को एहसास होता है कि भारत में कोई उनकी परवाह नहीं करता। अगर वे बेहतर करना चाहते हैं, तो उन्हें विदेश में एक अच्छी दौड़ का चयन करना पड़ता है। इसका एक हालिया उदाहरण टी गोपी हैं, जिन्होंने सात दिसंबर को वालेंसिया मैराथन में शानदार 2:12:23 का समय निकाला। टी गोपी, शिवनाथ सिंह के बाद भारत के दूसरे सबसे तेज मैराथन धावक हैं।
शिवनाथ को 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक में अपनी एक मैराथन के अलावा विदेश में प्रतिस्पर्धा करने का मौका नहीं मिला, जहां उन्होंने 2:16:22 का अच्छा समय निकालकर ग्यारहवें स्थान पर फिनिश किया था। इस ठहराव की स्थिति के लिए जिम्मेदारी केवल प्रतियोगिता आयोजकों की ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय फेडरेशन की भी है, जो घरेलू लंबी दूरी सर्किट का ढांचा बनाने में विफल रहा है। जो देश लगातार विश्व स्तरीय धावक पैदा करते हैं, वे यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके एथलीट उच्च गुणवत्ता वाली स्थितियों में, पेस सेटर, वैज्ञानिक प्रशिक्षण सहायता और एलीट प्रतियोगिता के संपर्क में रहकर अक्सर प्रतिस्पर्धा करें। हालांकि, भारत में, लंबी दूरी के धावकों में से अधिकतर को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है, जो कि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय सफलता तक कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है।
जब तक योजनाओं में बदलाव नहीं किया जाता, जिससे कि भारतीय धावकों को विदेश में मुकाबला करने के लिए आर्थिक मदद दी जाए, घरेलू दौड़ प्रतियोगिताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जाए और हिस्सा लेने के बजाय प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाए, तब तक भारतीय लंबी दूरी की दौड़ में पीछे ही रहेगें। केवल प्रतिभा काफी नहीं है, इसे प्रतियोगिता के जरिए निखारना होगा। तेज दौड़ और विश्व स्तरीय मैदान में लगातार हिस्सा लिए बिना, भारत असल में अपने धावकों से वैश्विक मानदंड को चुनौती देने की उम्मीद नहीं कर सकता।
लेकिन, सवाल है कि क्या सत्ता में बैठे लोग इस सलाह को मानेंगे। टी गोपी ने, भारत में कई मैराथन दौड़कर अपना समय बर्बाद करने के बाद अपने करियर के आखिर में, स्वयं ही दुनिया के सबसे तेज कोर्स में से एक का चयन कर अपना सबसे अच्छा समय हासिल किया।
उम्मीद है कि युवा मैराथन धावक भी ऐसा ही करेंगे और बेहतर समय हासिल करके भारत के स्तर को ऊपर उठाएंगे। अगर भारत में कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आता है, तो उन्हें यह स्वयं ही करना होगा।

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