श्री उमेश रेवणकर, कार्यकारी उपाध्यक्ष, श्रीराम फाइनेंस
भारत की वित्तीय तंत्र एक शांत लेकिन गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है। बेशक बैंक अभी भी कर्ज वितरण की नींव हैं। लेकिन हाल के वर्षों में गैर बैंक वित्तीय माध्यमों जैसे एनबीएफसी, कॉरपोरेट बॉन्ड, इक्विटी और विदेशी पूंजी की ओर झुकाव तेज़ी से बढ़ा है। नियामकीय सुधार, डिजिटल ढांचा और बदलती कर्जधारकों की पसंद इस बदलाव को और आगे बढ़ा रही हैं। नतीजा एक ज्यादा विविध और मजबूत क्रेडिट तंत्र के रूप में आपके सामने है।
गैर-बैंक माध्यमों से बढ़ते कर्ज
आरबीआई के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में कॉरपोरेट सेक्टर को कुल 35 लाख करोड़ रुपए का फंड मिला । भले ही सालाना आधार पर इसमें 3% की ही मामूली वृद्धि है। लेकिन सबसे अहम है इसकी विविध संरचना। लगभग आधा फंड यानी 17.1 लाख करोड़ रुपए (49%) गैर बैंकिंग चैनलों से आया। इनमें एनबीएफसी कर्ज, कॉरपोरेट बॉन्ड, इक्विटी इश्यू और एफडीआई शामिल हैं।
इसके मुकाबले बैंकों से मिलने वाले कर्ज 14% घटकर 17.9 लाख करोड़ रुपए ही रह गए । कंपनियों ने उसकी जगह तेजी वाले शेयर बाजारों का रुख किया। यहां उन्होंने 3.8 लाख करोड़ रुपए की पूंजी शेयरों के जरिए एकत्र की । यह पिछले साल से लगभग तीन गुना था। कॉरपोरेट बॉन्ड और कमर्शियल पेपर के माध्यम से उधारी भी 15% बढ़कर 2.1 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई।
यह बदलाव बताता है कि अर्थव्यवस्था परिपक्व हो रही है। कंपनियां अब केवल बैंक कर्ज पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि कई फंडिंग चैनलों का इस्तेमाल कर रही हैं।
एनबीएफसी:अपनी भूमिका का कर रहे और विस्तार
वैकल्पिक कर्जदाताओं में एनबीएफसी ने सबसे मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में एनबीएफसी ने 6.1 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दिया। यह साल दर साल के आधार 20% की वृद्धि थी। उनकी तेजी, दूरदराज़ इलाकों तक पहुंच और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी की क्षमता उन्हें बैंकों का स्वभाविक विकल्प बनाती है।
एमएसएमई, छोटे उद्यमियों और कस्बों में कई बार एनबीएफसी ही औपचारिक फाइनेंस का पहला द्वार होते हैं। उत्पादों में लचीलापन, स्थानीय समझ और तेजी से अनुमोदन उन्हें उन कर्जदारों तक पहुंचने में सक्षम बनाते है जो कई बार बैंक की प्राथमिकता नहीं होते।
कई एनबीएफसी अब वैकल्पिक डेटा और एआई-आधारित मॉडल अपना रहे हैं। इससे वे कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल वाले ग्राहकों को भी कर्ज दे रहे हैं। डिजिटल वितरण, ऑटोमेटेड रिस्क स्कोरिंग और माइक्रो-लोन जैसे नवाचार उनकी कर्ज देने की क्षमता को और बढ़ा रहे हैं।
एनबीएफसी के लिए फंडिंग स्रोतों का विविधीकरण और बैंक क्रेडिट में राहत
अपनी बढ़ती भूमिका के साथ एनबीएफसी अपने फंडिंग स्रोतों को भी विविध बना रहे हैं। बैंक उधारी के अलावा वे कॉरपोरेट बॉन्ड, सेक्यूरटाइजेशन, विदेशी उधारी और फिनटेक व बैंकों के साथ सह कर्ज (को लेंडिंग) मॉडल का उपयोग कर रहे हैं।
फर्स्ट-लॉस डिफॉल्ट गारंटी (शुरूआती नुकसान की साझेदारी), लोन पूलों में रिटेल निवेश और एपीआई-आधारित डिजिटल को-लेंडिंग (सह कर्ज) जैसे मॉडल उन्हें सस्ता और स्थिर फंड हासिल करने में मदद कर रहे हैं। इससे उनकी बैलेंस शीट मजबूत हो रही हैं। बैंकिंग सेक्टर में सुस्ती आने पर भी कर्ज का प्रवाह जस का तस बना रहता है।
एक बड़ा नियामकीय कदम तब आया जब आरबीआई ने बैंकों द्वारा एनबीएफसी को दिए जाने वाले कर्ज पर लागू बढ़े हुए जोखिम भार को वापस ले लिया । इससे एनबीएफसी के लिए उधारी की लागत कम हुई, तरलता बढ़ी और वे अधिक प्रतिस्पर्धी दरों पर कर्ज देने में सक्षम हो गए।
यह कदम मानता है कि एनबीएफसी देश की वित्तीय व्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह उन्हें एमएसएमई, किफायती आवास और उपभोक्ता कर्ज जैसे ज़रूरी क्षेत्रों को बेहतर सेवा देने की ताकत भी देता है। कर्ज लेने वालों के लिए इसका मतलब है कम ब्याज दरें और कर्ज आसानी से मिलने की सुविधा।
आने वाले समय में आरबीआई की ‘ओपन टैप बैंक लाइसेंसिंग’ नीति एक बड़ा बदलाव साबित होगी। अब नए बैंक लाइसेंस के लिए आवेदन किसी भी समय किए जा सकेंगे। इससे छोटे फाइनेंस बैंकों से लेकर पूरी तरह डिजिटल बैंकों तक कई तरह के नए, विशेषज्ञ खिलाड़ी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकेंगे।
इस बदलाव से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, नवाचार आएंगे और बैंक, एनबीएफसी तथा फिनटेक कंपनियों के बीच सहयोग के नए मौके बनेंगे। इसके परिणामस्वरूप देश में कर्ज देने के रास्ते और बढ़ेंगे। इससे पूरा वित्तीय तंत्र अधिक विविध और मजबूत बनेगा
एम्बेडेड फाइनेंस: क्रेडिट का अगला चरण
भारत में गैर-बैंकिंग चैनलों से आने वाला कर्ज तेजी से बढ़ रहा है, और इसी रफ्तार के साथ एम्बेडेड फाइनेंस एक भविष्यमुखी मॉडल के रूप में उभर रहा है। ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स, मोबिलिटी और सरकार की डिजिटल प्रणालियों में सीधे लोन सुविधाएं जोड़कर, यह मॉडल एनबीएफसी के भौतिक नेटवर्क को डिजिटल ताकत देता है।
इसके कई उदाहरण सामने हैं, जैसे आईआरसीटीसी की टिकट बुकिंग में शामिल यात्रा बीमा, यूपीआई के जरिए रोजमर्रा के लेनदेन, ओएनडीसी द्वारा छोटे विक्रेताओं को क्रेडिट और बीमा तक पहुंच और अकाउंट एग्रीगेटर के माध्यम से व्यक्तियों और एमएसएमई को सहमति-आधारित डेटा देकर आसान कर्ज उपलब्ध कराना।
एनबीएफसी के लिए एम्बेडेड फाइनेंस एक ऐसा माध्यम बन रहा है, जो शाखा-आधारित भरोसे को डिजिटल कार्यकुशलता से जोड़ता है। इससे नए ग्राहकों तक पहुंच बढ़ती है। प्रक्रियाओं में रुकावट घटती है। विस्तार तेज होता है।
गैर-बैंकिंग स्रोतों से बढ़ती पूंजी, एनबीएफसी की बढ़ती भूमिका, फंड जुटाने के नए विकल्प और जोखिम-भार (रिस्क वेटेज) में ढील जैसी नियामकीय पहल, तथा ‘ओपन टैप’ लाइसेंसिंग ये सभी मिलकर भारत की क्रेडिट प्रणाली को निर्णायक मोड़ पर ले जा रहे हैं।
इन्हीं परिवर्तनों के बीच, एम्बेडेड फाइनेंस क्रेडिट को सही समय पर, बिना झंझट और बिल्कुल सरल तरीके से बनाकर इस बदलाव को और आगे ले जाने की क्षमता रखता है।
पिछले दशकों का फोकस जहां बैंकिंग पहुंच बढ़ाने पर था, वहीं आने वाला दौर क्रेडिट प्रवाह को चौड़ा और विविध बनाने का होगा—जहां बैंक, एनबीएफसी, कैपिटल मार्केट और डिजिटल एम्बेडेड मॉडल मिलकर भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को गति देंगे।
