भारत में ‘तेरे टुकड़े हों’ जैसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये: मोहन भागवत

नयी दिल्ली/पोर्ट ब्लेयर, (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत में देश तोड़ने वाली भाषा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए तथा ‘तेरे टुकड़े हों’ जैसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये।

श्री भागवत ने अंडमान के बेओदनाबाद में कहा कि भारत हमेशा से एक राष्ट्र के रूप में चला है और भारत का संविधान भी देश की एकता एवं अखंडता को सर्वोच्च मानता है। उन्होंने कहा कि जब संविधान और समाज दोनों एकता की बात करते हैं, तो छोटी-छोटी बातों पर टकराव होना गलत है।

श्री भागवत ने कार्यक्रम में स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर के जीवन और व्यक्तित्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सावरकर का जीवन पूर्णता और राष्ट्रभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। वीर सावरकर की कविताओं और गीतों में उनकी भक्ति, देशप्रेम और समर्पण साफ दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि सावरकर देश की वेदना को अपना दुख मान लेते थे। जो व्यक्ति मातृभूमि से प्रेम नहीं करता, वह पुत्र कैसे कहलाए। उन्होंने कहा कि सावरकर की तन्मयता और देश के प्रति समर्पण आज के युवाओं के लिए प्रेरणा है।

श्री भागवत ने कहा कि आज समाज में लोग कई बार अपने छोटे-छोटे स्वार्थों को देश के ऊपर रख देते हैं। उन्होंने सलाह दी कि पहले राष्ट्र का हित सोचना चाहिए। उन्होंने कहा, “जब तक चल सकता है, हम देश के लिए चलें। अगर त्याग करना पड़े तो वह भी करें। लेकिन हमारी प्राथमिकता भारत होना चाहिए।”

श्री भागवत ने कहा कि सावरकर ने राष्ट्र की कल्पना को ‘हिंदू राष्ट्र’ कहा, जिसका अर्थ यह है कि हर व्यक्ति देश के लिए जीए और खुद को देश का हिस्सा मानकर चले। जीवन में एक बड़ा उद्देश्य देश के लिए समर्पित होना है। भक्ति ही वह शक्ति देती है जिससे व्यक्ति कठिनाइयों को सहन कर पाता है।

उन्होंने कहा, “हम सभी का संकल्प होना चाहिए कि जो भी करेंगे, देश के लिए करेंगे और सामूहिक प्रयास से भारत को अधिक शक्तिशाली और वैभवशाली बनाना है। राष्ट्र का मूल स्वरूप धर्मप्राण है और समय के साथ बाहरी चीजें बदलती रहती हैं, लेकिन देश के प्रति भावना स्थायी होनी चाहिए।

 

 

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