उच्चतम न्यायालय ने उमर खालिद, शरजील इमाम की जमानत पर फैसला सुरक्षित रखा

नयी दिल्ली, 10 दिसंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को 2020 के दिल्ली दंगों की साज़िश के मामले में छह आरोपियों उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम खान की ओर से दायर जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने विस्तृत सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सभी पक्षों को 18 दिसंबर तक सभी दस्तावेज़ जमा करने का निर्देश दिया और यह स्पष्ट किया कि अदालत 19 दिसंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन अवकाश से पहले इस मामले पर फैसला सुनाने का इरादा रखती है।

सुनवाई के दौरान, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता एसवी राजू ने तर्क दिया कि एक साज़िशकर्ता के कृत्यों को दूसरों पर भी आरोपित किया जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि शरजील इमाम के भाषणों को उमर खालिद के खिलाफ भी सबूत के तौर पर माना जा सकता है।

जब अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जेएनयू में कथित ‘टुकड़े-टुकड़े’ नारों को लेकर 2016 में दर्ज किये गये एक प्राथमिकी का उल्लेख किया तो, पीठ ने पूछा, “आप 2020 में हुए दंगों के लिए 2016 की पिछली प्राथमिकी क्यों दिखा रहे हैं? इसका इससे क्या लेना-देना है?”

अदालत ने दोनों पक्षों द्वारा सौंपे जा रहे अत्यधिक संख्या में दस्तावेजों पर भी चिंता व्यक्त की।

न्यायमूर्ति कुमार ने टिप्पणी की, “आपके वकील ने जज को या तो सहमत करने या भ्रमित करने की नीति अपनाई है।” पीठ ने सभी दस्तावेजों का एकल संकलन और समेकित संकलन दाखिल करने का निर्देश दिया।

अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन पक्ष देरी के लिए जिम्मेदार नहीं था और आरोपी आगे के सबूतों की प्रतीक्षा करने पर ज़ोर नहीं दे सकते। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उमर खालिद ने दंगों से खुद को दूर रखने के लिए जानबूझकर दंगों से पहले दिल्ली छोड़ दी थी।

श्री राजू ने कहा आरोपियों ने ‘एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म’ का इस्तेमाल किया और 11 मार्च, 2020 से सिग्नल (एक मैसेजिंग ऐप) का इस्तेमाल करने लगे। खालिद और अन्य आरोपी दिल्ली विरोध समर्थन समूह (जीपीएसजी) में प्रमुख व्यक्ति थे, जिनके संदेशों को बाद में उस समूह से हटा दिए गए थे। साज़िश बहुत पहले शुरू हुई थी और उनके भाषण उनके इरादे को दर्शाते हैं।

पीठ ने पूछा कि भाषणों को हिंसक कृत्यों से कैसे जोड़ा जा सकता है। इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाब दिया, “भाषण ने कार्रवाई को जन्म दिया। उनके भाषणों से पता चलता है कि आर्थिक सुरक्षा प्रभावित होगी। साज़िश पेट्रोल बमों का उपयोग करने और व्यापक घटनाएँ पैदा करने की थी।”

उल्लेखनीय है कि आरोपियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सितंबर के आदेश को चुनौती दी है जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर को उनकी याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था।

यह मामला फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे की कथित बड़ी साज़िश से संबंधित है, जिसके परिणामस्वरूप 53 मौतें हुईं और सैकड़ों लोग घायल हुए।

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और गैर-कानूनी गतिविधि अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें सांप्रदायिक आधार पर दंगों को भड़काने की एक समन्वित योजना का आरोप लगाया गया था।

उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर आपराधिक साज़िश, दंगा और यूएपीए अपराधों का आरोप लगाया गया है। शरजील इमाम को कई राज्यों में कई प्राथमिकियों का सामना करना पड़ रहा है।

दिल्ली पुलिस का दावा है कि आरोपियों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में ‘शासन-परिवर्तन’ की योजना बनाई थी। जबकि, आरोपियों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण विरोध के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर रहे थे।

पिछली सुनवाइयों में, दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया था कि दंगे पूर्व-नियोजित थे, सहज नहीं थे और भाषणों का उद्देश्य समाज को विभाजित करना था।

दूसरी ओर, आरोपियों ने तर्क दिया कि उन्होंने कभी भी हिंसा का आह्वान नहीं किया और उच्च न्यायालय द्वारा पहले जमानत दिए गए सह-आरोपियों के साथ समानता की मांग की।

 

 

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