छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर देश की अनिवार्य आवश्कता है, शांति विधेयक परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के डॉ भाभा के वचन की सिद्धि है: डॉ जितेंद्र सिंह

नयी दिल्ली, 15 जून (वार्ता) केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने सोमवार को कहा कि देश में बिजली तैयार करने के लिए छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर अब कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बनने जा रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलने के प्रावधानों वाला शांति ( भारत के कायाकल्प के लिए उन्नत परमणु ऊर्जा का स्वस्थ उपयोग) विधेयक 2025 के बाद छोटे माड्यूलर रिएक्टर देश में स्वच्छ ऊर्जा, अवसंरचना क्षेत्र की ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने का माध्यम और रोजगार और आजीविका का सहारा बनेंगे।

डॉ सिंह मोदी सरकार के नेतृत्व में 12 वर्षों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रगति पर प्रस्तुति देने के लिए यहां विशेष रूप से आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि शांति अधिनियम से संबंधित नियमों को सभी हितधारकों के साथ मिल कर अंतिम रूप दिया जा रहा है और इन्हें जल्द ही अधिसूचित करने की योजना है।

उन्होंने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश की अनुमति देने के मोदी सरकार के निर्णय को ‘क्रांतिकारी’ बताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर इससे पहले ‘राजनीतिक नेतृत्व का दृष्टिकोण यथास्थितिवादी था पर सौभाग्य से आज हमारे पास ऐसे प्रधानमंत्री है जिनमें साहसिक निर्णय करने की क्षमता है।”

वैज्ञानिक एवं औद्योगिकी अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में संवाददाताओं के सवालों को जवाब देते हुए शांति विधेयक और छोटी मॉड्यूलर परमाणु ऊर्जा भट्टियों से जुड़े सवालों पर डॉ सिंह ने कहा, ‘ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अब कोई चयन या विकल्प का विषय नहीं बल्कि जरूरत बन गये हैं, इन्हें करना ही करना है।’ इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे छोटे परमाणु रिऐक्टर तंग बस्तियों, घने क्षेत्रों, आवासीय समितियों, बड़े कारखानों और अवसंरचना परियोजनाओं तथा ऐसे दूर दराज के इलाकों में बिजली की सुविधा के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे जहां बिजली-ग्रिड की तार नहीं पहुंची है।

उन्होंने कहा कि 200 मेगावाट से कम की क्षमता वाले रिएक्टरों को स्माल (छोटे) रिएक्टर के रूप में परिभाषित किया गया है। सरकार छोटे निवेशकों को 100 मेगावाट के छोटे रिएक्टर लागाने की भी अनुमति देगी।

अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा विभागों के राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी निभा रहे डॉ सिंह ने शांति विधेयक को ‘अडानी, अंबानी’ के फायदे के लिए बनाया गया कानून बताने वालों की आलोचना को खारिज करते हुए कहा, ‘ मैं इस मौके पर शांति विधेयक को दो औद्योगिक घरानों के फायदे के लिए की जा रही व्यवस्था बताने वालों से कहना चाहूंगा कि, ऐसा नहीं है। हमने इसमें कैपिंग की है। इसमे 100 मेगा वाट तक के छोटे रिएक्टर भी लगाये जा सकते हैं। यह काम युवाओं का समूह बाहर से पूंजी जुटा कर कर सकता है। इसमें सरकार के अनुसंधान विकास एवं नवाचार के लिए बने कोष से 50 प्रतिशत तक की सहायता मिल सकती है।’

डॉ सिंह ने कहा कि पिछले साल पारित शांति विधेयक के तहत परमाणु (दुर्घटना) देनदारी कोष की शर्त भी कम कर दी गयी है। छोटे रिएक्टरों के लिए इसे 1000 करोड़ रुपये तक सीमित कर दिया गया है जो परमाणु दुर्घटना की स्थिति में उठे सिविल नुकसान के दावों के लिए होती है। इसे देने की जरूरत नहीं पड़ती,अभी तक कोई दुघर्टना नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि शांति अधिनियम के तहत हमारी परमणु कार्यक्रम वास्तव में स्वच्छ ऊर्जा का कार्यक्रम है। यह भारत के परमणु कार्यक्रम के जनक डॉ होमी भाभा के उस वचन को साकार करता है,जिसमें उन्होंने दुनिया को आश्वत किया था कि भारत का पूरमाणु कार्यक्रम ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का कार्यक्रम है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने कहा कि छोटे रिएक्टर भारत की खनिज ईंधन पर निर्भरता को कम करने में सहायक होगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने 2027 तक 100 गीगा वाट (एक लाख मेगावाट) परमाणु बिजली उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है। यह प्रधानमंत्री की 20270 तक कार्बन उत्सर्जन गहनता को घटा कर शुद्ध रूप से शून्य करने के लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

डॉ सिंह ने कहा आज के अनुमानों के अनुसार 2027 तक इस लक्षित क्षमता के साथ हम अपनी ऊर्जा की 10 प्रतिशत या उससे अधिक जरूरत परमाणु ऊर्जा से, 60-70 प्रतिशत से अधिक की जरूरत नवीकरणीय स्रोतों की ऊर्जा से प्राप्त करेंगे। इस तरह हम फॉसिल फ्यूल (कोयला आदि खनिज ईंधन) की जरूरत से 100 प्रतिशत मुक्त हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के परमणु ऊर्जा कार्यक्रम को लेकर विदेशी निवेशकों में रुचि दिखी है। अमेरिका से पिछले दिनों एक बड़ा दल दिल्ली और मुंबई की यात्रा पर आया था। उन्होंने भी भारत में निवेश की संभावनाओं और अवसरों की जानकारी लेने के साथ साथ कुछ सुझाव भी दिये हैं।

” भारत की सेवा में विज्ञान के 12 वर्ष” विषय पर इस विशेष संवाददता सम्मेलन को सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश सुधीर गोखले में पिछले 12 वर्ष में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति की जानकारी दी और इस दौरान हुई उपलब्धियों को अभूतपूर्व बताया।

उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक शांति विधेयक के जरिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में पिछले 60 से अधिक वर्षों से चले आ रहे सरकारी एकाधिकार को समाप्त किया गया है। सरकार अब निजी कंपनियों, संयुक्त उद्यमों और सरकारी संस्थाओं को परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और संचालन के लिए लाइसेंस दे सकती है। निजी और विदेशी निवेश परमाणु बिजली उत्पादन कारोबार में 49 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी ले सकते हैं।

इस विधेयक में कई पुराने कानूनों का विलय कर दिया गया है जिसमें ‘परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962’ और ‘परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010’ भी शामिल है।

इस विधेयक के अनुसार परमाणु सुरक्षा और संवेदनशील गतिविधियों का नियंत्रण पूरी तरह से केंद्र सरकार के हाथों में ही रहेगा। इसमें ‘परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड’ (एईआरबी ) को कानूनी दर्जा प्रदान किया गया है ।

 

 

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