मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की ई-अटेंडेंस के बाद अब विद्यार्थियों की उपस्थिति की ऑनलाइन निगरानी शुरू करने का शिक्षा विभाग का फैसला स्वागत योग्य है. शिक्षा व्यवस्था में सुधार की शुरुआत इस बुनियादी सवाल से ही होनी चाहिए कि स्कूल में बच्चे नियमित रूप से आ भी रहे हैं या नहीं. जब तक विद्यार्थी कक्षा में नहीं होंगे, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता और परीक्षा परिणाम सुधारने की कोई भी कवायद पूरी तरह सफल नहीं हो सकती. प्रदेश में करीब 8400 हाईस्कूल और 5100 हायर सेकंडरी स्कूल हैं, जिनमें 25 से 26 लाख विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति की निगरानी केवल कागजी रजिस्टरों के भरोसे संभव नहीं है. एजुकेशन पोर्टल 3.0 पर प्रतिदिन कक्षा और स्कूलवार उपस्थिति दर्ज होने से शिक्षा विभाग के पास पहली बार ऐसा बड़ा डेटा उपलब्ध होगा, जिसके आधार पर यह पता लगाया जा सकेगा कि किन इलाकों में बच्चे स्कूल से दूर हो रहे हैं. 70 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाले स्कूलों को रेड जोन और 50 प्रतिशत से कम वाले स्कूलों को ग्रे जोन में रखना उपयोगी व्यवस्था है. लेकिन असली परीक्षा इस व्यवस्था की निगरानी से आगे शुरू होगी. रेड या ग्रे जोन में आने वाले स्कूलों के आंकड़े देखकर यदि अधिकारी केवल रिपोर्ट तैयार करते रहे तो इस पूरी कवायद का उद्देश्य ही अधूरा रह जाएगा. जरूरत इस बात की है कि कम उपस्थिति वाले स्कूलों तक अधिकारी पहुंचें और यह पता लगाएं कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं. क्या आर्थिक मजबूरी उन्हें पढ़ाई से दूर कर रही है ? क्या स्कूल की दूरी या परिवहन की समस्या है ? क्या परिवारों में शिक्षा को लेकर जागरूकता का अभाव है ? या फिर विद्यालय का वातावरण ही ऐसा है कि बच्चों की स्कूल आने में रुचि नहीं है ? इन सवालों के जवाब तलाशना और समाधान की जिम्मेदारी तय करना भी ऑनलाइन मॉनीटरिंग का हिस्सा होना चाहिए.
शिक्षा विभाग का इस वर्ष 95 प्रतिशत रिजल्ट का लक्ष्य है. लक्ष्य महत्वाकांक्षी है और उसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन बेहतर परिणाम केवल परीक्षा के दिनों में तैयारी कराने से नहीं आएंगे. इसके लिए पूरे साल विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति, शिक्षकों की जवाबदेही और पढ़ाई के स्तर पर लगातार निगरानी जरूरी है. इसलिए अगस्त में चल रहा ट्रायल और सितंबर से प्रस्तावित पूर्ण क्रियान्वयन महज एक अभियान बनकर न रह जाए. इस व्यवस्था को स्थायी बनाया जाना चाहिए. हर सात दिन में डेटा की समीक्षा हो, हर महीने कम उपस्थिति वाले स्कूलों की जमीनी स्थिति की जांच हो और अगले महीने यह देखा जाए कि सुधार हुआ या नहीं. इसके साथ शिक्षा विभाग को विद्यार्थियों की उपस्थिति के साथ मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की भी इसी गंभीरता से निगरानी करनी चाहिए. स्कूल में बच्चा आया, लेकिन उसे निर्धारित समय पर गुणवत्तापूर्ण और पौष्टिक भोजन मिला या नहीं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है. सरकारी स्कूल केवल परीक्षा परिणाम सुधारने की जगह नहीं हैं. वे लाखों बच्चों के भविष्य की नींव हैं. इसलिए निगरानी का उद्देश्य सिर्फ 95 प्रतिशत रिजल्ट हासिल करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हर बच्चा नियमित स्कूल आए, उसे अच्छी शिक्षा मिले और सम्मानजनक वातावरण के साथ पौष्टिक भोजन भी मिले. ऑनलाइन मॉनीटरिंग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. दरअसल,
अब सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्क्रीन पर दिखने वाले आंकड़े जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव में भी बदलें. निगरानी अभियान नहीं, व्यवस्था बनेगी तभी सरकारी स्कूलों की तस्वीर वास्तव में बदलेगी.
