काली बिल्ली, आधी रात का आईना और भूत का डर… ‘यादें’ के कलाकारों ने खोले बचपन के उन राज़ों के पन्ने, जिन पर कभी था पूरा यकीन

मुंबई, 10 अगस्त (वार्ता) बचपन की दुनिया भी कितनी अजीब होती है। कभी काली बिल्ली का रास्ता काटना किसी अनहोनी का संकेत लगता है, कभी आधी रात को आईने में देखने से डर लगता है और कभी घर में सीटी बजाने भर से भूत के आने का खौफ सताने लगता है। बड़े होने के बाद भले ही इन बातों पर हंसी आए, लेकिन बचपन में यही छोटी-छोटी मान्यताएं बिल्कुल सच लगती थीं। सोनी सब के शो ‘यादें’ में इन दिनों एक रहस्यमयी शापित ममी ने अस्पताल के डॉक्टरों को उलझा दिया है।

मेडिकल केस सुलझाने वाले डॉक्टर जब इस रहस्य के जवाब तलाश रहे हैं, तब इस ट्रैक ने शो के कलाकारों को भी अपने बचपन की उन दिलचस्प यादों में लौटने का मौका दिया, जब उन्होंने कई मजेदार अंधविश्वासों और डरावनी कहानियों को सच मान लिया था। ‘यादें’ अपने अनोखे अंदाज में मेडिकल कहानियों के साथ हास्य और रहस्य का तड़का लगाता है। लेकिन शापित ममी का यह ट्रैक कहानी को एक डरावना और रोमांचक मोड़ देता है। पर्दे पर जहां ममी का रहस्य कौतूहल जगा रहा है, वहीं पर्दे के पीछे कलाकारों ने अपने बचपन के उन मासूम विश्वासों को याद किया, जिन्हें कभी उन्होंने बिना सवाल किए सच मान लिया था।

शो में डॉ. सृष्टि अग्रवाल की भूमिका निभा रहीं गुलकी जोशी के बचपन का एक विश्वास अंधविश्वास से ज्यादा ‘राज़ छिपाकर रखने’ से जुड़ा था। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा मानती थी कि अच्छी खबर किसी को तब तक नहीं बतानी चाहिए, जब तक वह सच में हो न जाए, वरना वह पूरी नहीं होती। यह मैंने बचपन से सुना था और लंबे समय तक बिना सवाल किए इसे मानती रही। चाहे ऑडिशन हो, परीक्षा का रिजल्ट हो या कोई रोमांचक चीज जिसका इंतजार हो, मैं सब अपने तक ही रखती थी। आज मैं इसे उसी तरह नहीं मानती, लेकिन यह मजेदार है कि कैसे कुछ बचपन के विश्वास सालों तक हमारे साथ रहते हैं, जब तक हमें समझ नहीं आता कि ये बस कहानियां थीं, जिन्हें हम बचपन में सुनते आए हैं।”

दिग्गी का किरदार निभा रहे अर्जुन पुंज को बचपन में काली बिल्ली का डर सताता था। उन्होंने बताया, “बचपन में मैं सचमुच मानता था कि अगर काली बिल्ली रास्ता काट दे तो कुछ अशुभ होगा। मुझे साफ याद है कि मैं वहीं रुक जाता था और इंतजार करता था कि कोई और पहले उसे पार करे। उस उम्र में यह बिल्कुल सामान्य लगता था, क्योंकि आसपास सभी यही मानते थे। अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो हंसी आती है कि हम इन मिथकों को बिना सवाल किए मान लेते थे।” डॉ. अबीर की भूमिका निभा रहे अविन्न त्यागी का डर थोड़ा ज्यादा रहस्यमयी था। उन्होंने कहा, “जब मैं बच्चा था, मैं सचमुच मानता था कि यदि मैं आधी रात को आईने में देखूं तो मुझे अपने पीछे कुछ अलौकिक दिखाई देगा। मुझे तो यह भी याद नहीं कि मैंने यह कहां से सुना था, लेकिन इतना काफी था कि मैं सालों तक रात में आईने से दूर रहा। अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो मजेदार लगता है कि हमारी कल्पना कैसे छोटी-सी चीज को भी डरावना बना देती है। शुक्र है कि अब मैं उन डर से बाहर आ चुका हूं।”

वहीं, डॉ. रौनक का किरदार निभा रहे देविश आहुजा के बचपन में सीटी बजाने पर भूत के आने का डर बैठ गया था। उन्होंने कहा, “बचपन में किसी ने मुझे यकीन दिला दिया था कि यदि मैं रात में सीटी बजाऊं तो घर में भूत आ जाएगा। मैं इतना मानता था कि सूरज ढलने के बाद गुनगुनाना भी छोड़ देता था। अब यह मजेदार लगता है, लेकिन उस समय यह बिल्कुल सच लगता था। इस रहस्यमयी ममी ट्रैक पर काम करना मेरे लिए बहुत नॉस्टैल्जिक अनुभव रहा है, क्योंकि इसने उन मासूम बचपन के डर को फिर से याद दिला दिया, जिन्हें हम कभी सच मानते थे।” बचपन के ये विश्वास भले ही आज हंसी का कारण बन गए हों, लेकिन यही मासूम डर और कल्पनाएं हमारी यादों का ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हें उम्र बढ़ने के बाद भी भुलाना आसान नहीं होता। ‘यादें’ का शापित ममी ट्रैक भी इसी रहस्य, रोमांच और बचपन के डर की दुनिया को एक नए अंदाज में सामने ला रहा है।

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