छेड़छाड़ पर सख्त कार्रवाई हो

मध्य प्रदेश के इंदौर में एक राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज के साथ चलती बस में हुई छेड़छाड़ की घटना न सिर्फ एक आपराधिक वारदात है, बल्कि हमारी सार्वजनिक सुरक्षा और संस्थागत लापरवाही का काला परिचय भी है.

एक ऐसी खिलाड़ी जो देश का नाम ऊंचे मंचों पर रोशन करती है, अगर बस में यात्रा के दौरान अपनी इज्जत बचाने के लिए संघर्ष करे तो यह समाज के लिए शर्मनाक संकेत है.

घटना के दौरान पीडि़ता ने साहस दिखाया और आरोपियों का विरोध कर उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार महिला को ही सुरक्षा की जिम्मेवारी उठानी होगी.

कथित तौर पर नशे में धुत कंडक्टर और ड्राइवर द्वारा बस सडक़ पर छोडक़र फरार हो जाना सिर्फ आपराधिक कृत्य नहीं, वह यात्रियों के विश्वास के साथ बड़ा धोखा भी है.

यह घटना यह स्पष्ट करती है कि निजी बस ऑपरेटरों के संचालन में पारदर्शिता और जमकर नियमों की कमी है, जिससे यात्रियों की सुरक्षा संकट में है.

इंदौर पहले भी ऐसी घटनाओं का गवाह रह चुका है और बार-बार आश्वासन के बावजूद ठोस सुधार दिखाई नहीं देते, जिसका खामियाजा सीधे महिलाओं और सामान्य यात्रियों को भुगतना पड़ता है.

किसी घटना पर केस दर्ज कर लेना आवश्यक कदम है, परन्तु यह अपर्याप्त है अगर साथ में सिस्टम में नीतिगत और तकनीकी सुधार न हों.

प्राथमिक और तात्कालिक कदम के तौर पर सभी निजी बसों के ड्राइवरों और कंडक्टरों का अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन लागू होना चाहिए ताकि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग यात्रियों की जि़म्मेदारी न उठाएं.

दूसरा कदम यह होना चाहिए कि बस स्टाफ के नशे में होने की किसी भी शिकायत पर शून्य सहनशीलता की नीति अपनाई जाए और तुरंत निलंबन व कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए.

तीसरा और निर्णायक कदम तकनीकी प्रावधानों का अनिवार्य करार देना है, जिसमें हर बस में पैनिक बटन, सीसीटीवी कैमरा और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम शामिल हों, ताकि आपातकालीन स्थितियों में तुरंत कार्रवाई संभव हो.

इन उपायों के साथ यात्रियों के लिए एक सीधी शिकायत लाइन और शिकायतों का शीघ्र निवारण भी सुनिश्चित होना चाहिए ताकि पीडि़त को तत्काल राहत और न्याय मिल सके.

परिवहन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस के संयुक्त निरीक्षण और ऑडिटिंग सिस्टम के माध्यम से निजी बस ऑपरेटरों की सामयिक जांच अनिवार्य होनी चाहिए.

सि$र्फ दंडात्मक कार्रवाई करने भर से समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी, इसलिए चालक और कंडक्टर भर्ती के समय प्रशिक्षण, मानसिक परीक्षण और रेगुलर रिफ्रेशर कोर्स भी अनिवार्य किए जाने चाहिए.

समाज को भी स्थिति की गंभीरता समझकर सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी और हर नागरिक को ऐसे कृत्यों के खिलाफ सक्रिय होना चाहिए.

अगर प्रशासन तुरंत और कठोर कदम नहीं उठाता, तो ऐसी घटनाएं अनवरत होती रहेंगी और सार्वजनिक परिवहन का भरोसा कमजोर होता रहेगा.

इंदौर की यह घटना केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के प्रति हमारी संवेदनशीलता का आईना है, इसलिए अब समय है कि बोलकर नहीं, कर के दिखाया जाए. जाहिर है दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा मिलनी चाहिए. इस तरह की शर्मनाक घटनाएं फिर से ना हो यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

 

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