पाकिस्तान की संसद द्वारा पारित 27 वें संवैधानिक संशोधन ने उसके सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को जिस तरह की असीमित शक्तियां प्रदान की हैं, वह केवल पड़ोसी देश की राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव नहीं है. यह पूरे दक्षिण एशिया, विशेष रूप से भारत की सुरक्षा संरचना को सीधे प्रभावित करने वाला निर्णय है. ‘फील्ड मार्शल’ का आजीवन पद, ‘चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज’ के रूप में तीनों सेनाओं का केंद्रीकृत नियंत्रण, और कानूनी सुरक्षा,यह सब पाकिस्तान के इतिहास में सैन्य वर्चस्व को पहली बार संवैधानिक वैधता प्रदान करते हैं. यह स्थिति भारत के लिए गहरी चिंता और नई रणनीतिक सतर्कता की मांग करती है.
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार का संचालन करने वाली स्ट्रेटेजिक प्लान्स डिवीजन अब सीधे तौर पर जनरल मुनीर के प्रभाव में है. सैद्धांतिक रूप से यह नियंत्रण पहले नागरिक सरकार के अधीन माना जाता था, पर अब ‘एक व्यक्ति—एक आदेश’ की अवधारणा पाकिस्तान की परमाणु नीति को और अनिश्चित बना देती है. किसी भी संकट की स्थिति में निर्णय लेने का समय कम होगा और पूरे क्षेत्र की स्थिरता जनरल मुनीर की व्यक्तिगत मानसिकता पर निर्भर होगी. भारत जैसे परमाणु क्षमता संपन्न देश के लिए यह बदलाव गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि यह सामरिक संतुलन को व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर बना देता है. इस संशोधन के बाद पाकिस्तान में नागरिक-सैन्य शक्ति संतुलन का कोई अस्तित्व नहीं बचा है. सेना अब न केवल पर्दे के पीछे, बल्कि संविधान की शक्ति से वैधानिक रूप से उच्चतम राजनीतिक संस्था बन गई है. जनरल मुनीर को मिला आजीवन कार्यकाल और कानूनी संरक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं लगभग ध्वस्त हो चुकी हैं. बाहरी दुनिया के लिए अब पाकिस्तान से संवाद का अर्थ होगा,सीधे सैन्य प्रतिष्ठान से बातचीत. यह स्थिति भारत के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि सैन्य नेतृत्व अक्सर कठोर, तात्कालिक और जोखिमपूर्ण निर्णयों को प्राथमिकता देता है, जो सीमाई तनाव को किसी भी समय भडक़ा सकता है.
पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब भी वहां आंतरिक अस्थिरता बढ़ती है, सैन्य नेतृत्व भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकी गतिविधियों, संघर्ष विराम उल्लंघन या एलओसी पर तनाव बढ़ाने जैसे कदमों का सहारा लेता है. अब जबकि जनरल मुनीर को असीमित शक्तियां मिल चुकी हैं और नागरिक जवाबदेही समाप्त हो गई है, इस तरह की उकसावे की कार्रवाइयों में वृद्धि की आशंका और मजबूत हो जाती है.जाहिर है भारत के सामने अब एक स्पष्ट और कठोर चुनौती है,एक ऐसे पड़ोसी से निपटना, जहां सत्ता का केंद्र पूरी तरह सैन्य संरचना में निहित है. अब एलओसी पर तकनीकी व मानव खुफिया क्षमताओं को और मजबूत करना अत्यावश्यक है. किसी भी असामान्य सैन्य गतिविधि पर तत्काल, तेज और सटीक प्रतिक्रिया की व्यवस्था अनिवार्य हो गई है. दरअसल, चीन-पाकिस्तान की बढ़ती सामरिक साठगांठ को देखते हुए भारत को एक साथ दो मोर्चों पर संभावित खतरे से निपटने की क्षमता को उन्नत करना होगा. कुल मिलाकर भारत को अपनी पारंपरिक और परमाणु क्षमता का संतुलित लेकिन ठोस संदेश देना होगा कि किसी भी आक्रामक कदम की कीमत पाकिस्तान को अत्यंत महंगी चुकानी पड़ेगी.
बहरहाल, पाकिस्तान में लोकतांत्रिक परंपराओं का मुखौटा अब गिर चुका है और सत्ता पूरी तरह सैन्य प्रतिष्ठान की गिरफ्त में है. यह नया ढांचा क्षेत्रीय संतुलन के लिए चुनौतीपूर्ण है. शांति की उम्मीद रखना आवश्यक है, पर भारत के लिए अब पहले से कहीं अधिक जरूरी है कि वह हर परिस्थिति के लिए तैयार रहे—क्योंकि पड़ोसी के हाथ में अब असीमित शक्ति है और उसके निर्णयों पर कोई संवैधानिक रोक नहीं.
