नयी दिल्ली, 10 नवंबर (वार्ता) मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने सोमवार को कहा कि न्यायपालिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दुरुपयोग और उसके माध्यम से हेरफेर की गई डिजिटल सामग्री से उत्पन्न संभावित जोखिमों से अच्छी तरह वाकिफ है।
उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के दाैरान यह टिप्पणी की। इस जनहित याचिका में उच्चतम न्यायालय से केंद्र सरकार को देश भर के न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों में जेनरेटिव एआई (जेनएआई) के उपयोग को विनियमित करने के लिए एक व्यापक नीति या दिशानिर्देश तैयार करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा, “हाँ, हाँ, हमने भी अपनी छेड़छाड़ की गई तस्वीरें देखी हैं।” उन्होंने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, “आप चाहते हैं कि इसे अभी खारिज कर दिया जाए या हमें इसे दो सप्ताह बाद देखना चाहिए?” इसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए स्थगित कर दी।
अधिवक्ता कार्तिकेय रावल द्वारा दायर याचिका में अदालती प्रक्रियाओं में जेनएआई के विनियमित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए एक समान विधायी या नीतिगत ढाँचे को लागू करने की मांग की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि जहाँ पारंपरिक एआई निर्धारित मापदंडों के भीतर काम करता है, वहीं जनरेटिव एआई में नई विषय-वस्तु बनाने की क्षमता है, जो अदालतों को गुमराह कर सकता है। यह मनगढ़ंत कानूनी संदर्भ, पक्षपातपूर्ण परिणाम या अप्रत्याशित व्याख्याएँ दे सकता है, जो न्यायालय को भ्रमित कर सकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत न्याय के सिद्धांतों को कमजोर कर सकती हैं।

