
साक्षी केसरवानी भोपाल। घुटने के दर्द से परेशान मरीजों के लिए अब राहत की नई उम्मीद जगी है। यूनिकॉम्पार्टमेंटल नी रिप्लेसमेंट यानी यूकेआर तकनीक अब भोपाल में भी उपलब्ध हो रही है। इस नई तकनीक को लेकर भोपाल में आयोजित लाइव सर्जरी वर्कशॉप का आयोजन किया गया। जिसमें प्रदेश के कई डॉक्टरों ने इस तकनीकि को वर्कशॉप के जरिए समझा। इंदौर के सुप्रसिद्ध जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ हेमंत मंडोवरा से बातचीत में उन्होंने बताया कि घुटनों में दर्द का सबसे बड़ा कारण आजकल बदलती जीवनशैली, खानपान, घंटों एक जगह बैठे रहना, व्यायाम न करना और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी बीमारियां हैं। कई बार यह समस्या इतनी बढ़ जाती है कि सामान्य दवा या फिजियोथेरेपी से राहत नहीं मिलती। ऐसे में यूनिकॉम्पार्टमेंटल नी रिप्लेसमेंट सर्जरी घुटने के इलाज में भविष्य की नई दिशा है। यूकेआर सर्जरी उन मरीजों के लिए एक आधुनिक और प्रभावी विकल्प है, जो घुटने के शुरुआती या केवल एक हिस्से के आर्थराइटिस से पीड़ित हैं। यह सटीक, सुरक्षित और मरीज-केंद्रित तकनीक है। जो आर्थराइटिस से हजारों लोगों को फिर से दर्दमुक्त और सक्रिय जीवन जीने की राह दिखाएगी।
यूकेआर तकनीक क्यों है खास
डॉ मंडोवरा के अनुसार यूनिकॉम्पार्टमेंटल नी रिप्लेसमेंट तकनीक में पूरे घुटने को नहीं बल्कि केवल प्रभावित हिस्से को बदला जाता है। इस प्रक्रिया में छोटा चीरा लगाया जाता है, खून बहुत कम बहता है और ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं पड़ती। मरीज को बहुत कम दर्द होता है और वह सर्जरी के अगले ही दिन बैसाखी के सहारे चलना शुरू कर देता है। एक हफ्ते के भीतर मरीज सामान्य रूप से चलने, दौड़ने और हल्की खेल गतिविधियां करने में सक्षम हो जाता है। इस तकनीक से घुटने की प्राकृतिक गति लगभग सुरक्षित रहती है और मरीज को जोड़ों में कृत्रिमपन का अहसास नहीं होता।
सर्जरी की सफलता और उपलब्धता
डॉ मंडोवरा ने बताया कि इस तकनीक से अब तक किए गए ऑपरेशन में 50 में से लगभग 30 प्रतिशत मरीज पूरी तरह दर्द से मुक्त हो चुके हैं। इंदौर में ऐसी सर्जरी अब सामान्य रूप से की जा रही हैं और वहां के परिणाम बेहद संतोषजनक हैं। अब जीएमसी भोपाल और राज्य के अन्य अस्पतालों के डॉक्टरों को प्रशिक्षण देकर इस तकनीक को और व्यापक रूप से अपनाने की तैयारी की जा रही है।
ग्रामीण इलाकों तक तकनीक पहुंचाने की योजना
यह सर्जरी शहरी इलाकों तक सीमित है, लेकिन प्रयास है कि इसे राज्य के हर छोर तक पहुंचाया जाए ताकि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज भी इसका लाभ ले सकें। उन्होंने कहा कि अगर सरकार सहयोग करे और इस तकनीक को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत शामिल किया जाए तो अधिक से अधिक जरूरतमंद मरीजों को सुलभ इलाज मिल सकेगा।
कम उम्र में भी बढ़ रही घुटने की समस्या
पहले घुटनों की समस्या अधिकतर बुजुर्गों में देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी यह परेशानी तेजी से बढ़ रही है। हालांकि व्यक्ति का स्वास्थ्य सामान्य है तो वह 90 वर्ष की उम्र तक भी यह सर्जरी सफलतापूर्वक करवा सकता है। डॉ मंडोवरा ने बताया कि पूर्व में किए गए कई ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहे हैं और मरीज अब अपने सामान्य जीवन में सक्रिय हैं।
