निष्पक्ष और पारदर्शी दिखना भी आवश्यक

भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें जितनी गहरी हैं, उनमें चुनाव आयोग की भूमिका उतनी ही केंद्रीय है. विश्व-भर में भारतीय निर्वाचन आयोग को एक ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता है, जिसने विशाल, विविध और जटिल देश में भी चुनाव प्रक्रियाओं को शांतिपूर्ण, सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से संचालित किया है. विकसित लोकतांत्रिक देश भी भारत की चुनावी पारदर्शिता और प्रबंधन क्षमता की मिसाल देते रहे हैं. यह साख दशकों से बनी है और हर चुनाव के साथ मजबूत होती गई है.

लेकिन हाल के दिनों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों ने इस छवि के आसपास एक नई बहस को जन्म दे दिया है. बुधवार को उन्होंने एक विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रेजेंटेशन दिखाते हुए दावा किया कि हरियाणा विधानसभा चुनावों में व्यापक गड़बडिय़ां हुईं. उनके अनुसार, मतदाता सूची में 25 लाख फर्जी नाम पाए गए, और उन्होंने उदाहरण दिया कि एक ब्राज़ीलियन मॉडल का नाम कथित रूप से 22 अलग-अलग बूथों पर शामिल है. ये आरोप अपनी प्रकृति में गंभीर हैं और मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया पर सीधे सवाल खड़े करते हैं. निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का तुरंत, बिंदु वार और तर्कसंगत उत्तर जारी किया. आयोग ने बताया कि मतदाता सूची डिजिटल रूप से जुड़ी हुई है, हर प्रविष्टि की पहचान एआई आधारित डुप्लीकेशन सिस्टम से की जाती है, और किसी विदेशी नागरिक का नाम मतदाता सूची में होना तकनीकी रूप से लगभग असंभव है. आयोग की सफाई तथ्यपरक थी, लेकिन फिर भी कुछ प्रश्नों पर राजनीतिक व सार्वजनिक स्तर पर चर्चा बनी हुई है. यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण सीख सामने आती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सिर्फ निष्पक्ष और पारदर्शी होना ही पर्याप्त नहीं, उन्हें निष्पक्ष और पारदर्शी दिखना भी चाहिए. लोकतंत्र का भरोसा केवल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि उन प्रक्रियाओं की सार्वजनिक विश्वसनीयता से भी निर्मित होता है. यदि जनता के मन में शंका उठती है, तो संस्थान का यह कर्तव्य है कि वह सभी प्रश्नों का व्यापक, समग्र और सार्वजनिक रूप से संतोषजनक समाधान प्रस्तुत करे.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि मतदाता सूची जैसी प्रक्रियाएं निरंतर संशोधित होती रहती हैं. भारत में प्रवासन, नगरीकरण और सामाजिक गतिशीलता के कारण बड़ी संख्या में प्रविष्ठियां बदलती हैं, हटती हैं या जोड़ी जाती हैं. ऐसे में तकनीकी त्रुटियों की संभावना शून्य तो नहीं की जा सकती, लेकिन इनकी निगरानी के लिए मजबूत तंत्र मौजूद हैं. यह जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है कि वह इन प्रक्रियाओं को और अधिक आधुनिक, स्वचालित और त्रुटिरहित बनाए, और जनता को नियमित रूप से अपडेट दे. इसी के साथ राजनीतिक दलों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने आरोपों में तथ्यों और संयम का पालन करें. चुनावी परिवेश में तीखे आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक हैं, लेकिन एक संवैधानिक संस्था पर बिना पर्याप्त प्रमाण के निशाना साधना जनता के भरोसे को चोट पहुंचाता है. राजनीतिक दलों का दायित्व है कि वे आलोचना करें, लेकिन ऐसी आलोचना जो लोकतंत्र को मजबूत करे, न कि संस्थानों पर अनावश्यक अविश्वास पैदा करे. केंद्रीय निर्वाचन आयोग संविधान की प्रतिष्ठा का प्रतीक है. इसलिए उसके खिलाफ बयान देते समय राजनीतिक मर्यादा और तथ्यात्मक जिम्मेदारी अनिवार्य है. दूसरी ओर, आयोग को भी अपनी पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को लगातार उन्नत करना होगा, ताकि कोई भी प्रश्न अनुत्तरित न रहे. जाहिर है लोकतंत्र में विश्वास,संस्थानों और जनता दोनों के साझा प्रयास से ही कायम रहता है. यही विश्वास भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, और इसे हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

 

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