जबलपुर: पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गयी थी। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस ए के सिंह की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीडिता के साथ प्रवेशात्मक यौन हमला नहीं किया गया था। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। तथ्यों और विषय से संबंधित कानून का मूल्यांकन किये बिना मनमाना आदेश पारित किया है। युगलपीठ ने आजीवन कारावास की सजा से तीन साल में तब्दील करने के आदेश जारी किये है।
बैतूल जिले के मुलताई न्यायालय के द्वारा चचेरी नाबालिग बहन से दुराचार के अपराध में पॉस्को एक्ट की धारा धारा 5(एम)/6 और 5(एन)/6 के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित किये जाने को चुनौती देते हुए अपील दायर की गयी थी। अभियोजन के अनुसार अभियुक्त गुलाब राव उर्फ गुल्लू शराब के नशे में चाचा के घर पहुॅचा। उसकी चाची दुकान में बैठी थी और नाबालिग चचेरी बहन घर के अंदर थी। आरोपी ने नाबालिग चचेरी बहन से दुराचार कर रहा था तभी उसकी चाची अंदर आ गयी। पीडित तथा अभियुक्त के कपडे घुटने के नीचे तक उतरे हुए थे।
अपीलकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि अभियोजन के अनुसार घटना 27 मई की शाम साढ़े पांच व छह बजे की बीच के दौरान हुई थी। जिसकी रिपोर्ट दूसरे दिन सुबह दर्ज करवाई। डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार पीडिता की जांच में आंतरिक व बाहरी चोट नहीं पाई गयी थी। योनिच्छद बरकरार थी और घर्षण, लालिमा या किसी अन्य स्राव व दाग के कोई निशान नहीं थे। उसके साथ प्रवेशात्मक यौन संबंध स्थापित नहीं होने के कारण योनि स्लाइड तैयार नहीं की थी।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित के साथ प्रवेशात्मक यौन हमला नहीं किया गया है। उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है जो पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 में परिभाषित तथा धारा 8 के तहत दंडनीय है। युगलपीठ ने उक्त तल्ख टिप्पणी करते हुए आजीवन कारावास की सजा की सजा को घटाकर तीन साल किये जाने के आदेश जारी किये है।
