देश में बढ़ते कचरे के पहाड़, दम तोड़ती नदियां, जहरीली होती हवा और शहरों की बिगड़ती सेहत के बीच सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला केवल एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतावनी है. भोपाल के एक पर्यावरणविद् की याचिका पर शीर्ष अदालत ने जिस प्रकार सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की निगरानी अपने हाथ में लेते हुए छह सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट एम्पॉवर्ड मॉनिटरिंग कमेटी (एससीएमसी) गठित की है, वह बताता है कि अब कचरा प्रबंधन को केवल नगर निगमों की सीमित जिम्मेदारी मानने का दौर समाप्त होना चाहिए.
देश के अधिकांश शहर आज ‘लीगेसी वेस्ट’ यानी वर्षों से जमा कचरे की भयावह समस्या से जूझ रहे हैं. दिल्ली, मुंबई, भोपाल, इंदौर, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में कचरे के पहाड़ पर्यावरणीय आपदा का रूप ले चुके हैं. विडंबना यह है कि स्व‘छता अभियान, स्मार्ट सिटी और हरित विकास जैसे बड़े नारों के बावजूद कचरा प्रबंधन की जमीनी स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है. ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती प्रशासनिक तंत्र को जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम है.
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब किसी रा’य या केंद्र शासित प्रदेश को लीगेसी वेस्ट निपटान के लिए अतिरिक्त समय नहीं मिलेगा. यह संदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्षों से पर्यावरणीय नियमों के पालन में देरी को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मान लिया गया था. अब जवाबदेही तय होगी और लापरवाही पर कार्रवाई भी.
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कचरा प्रबंधन को केवल सरकारी काम मानने की मानसिकता पर चोट की है. अदालत ने महात्मा गांधी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब हर व्यक्ति कचरा पैदा करता है तो उसकी जिम्मेदारी भी सभी की होनी चाहिए. वास्तव में भारत में स्व‘छता को अब भी ‘दूसरे का काम’ समझने की सामाजिक प्रवृत्ति मौजूद है. लोग घर साफ रखते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैलाने में संकोच नहीं करते. यही सोच शहरों को गंदगी और बीमारियों की ओर धकेलती है.
स्कूली पाठ्यक्रम में कचरा प्रबंधन को शामिल करने का निर्देश दूरगामी महत्व रखता है. पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनों से नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन से संभव होता है. यदि बचपन से ही कचरा पृथक्करण, रिसाइक्लिंग और स्व‘छता की संस्कृति विकसित की जाए तो आने वाले वर्षों में स्थिति बदल सकती है. विकसित देशों में नागरिक अनुशासन ही स्व‘छता की सबसे बड़ी ताकत है.
सुप्रीम कोर्ट ने कलेक्टरों को अवैध डंपिंग और अनधिकृत कचरा परिवहन पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. साथ ही वेबसाइट पर प्रगति और फोटो अपलोड करने का आदेश प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में सकारात्मक पहल है. इससे जनता निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा बन सकेगी.
यह भी सच है कि केवल कमेटियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा. नगर निकायों की क्षमता बढ़ाना, आधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करना, स्रोत स्तर पर कचरा पृथक्करण लागू करना और नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करना समान रूप से आवश्यक है. भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना देखता है तो स्व‘छ और टिकाऊ शहर उसकी अनिवार्य शर्त होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि स्व‘छता केवल अभियान नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है. अब देखना यह होगा कि सरकारें, प्रशासन और नागरिक इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं.
