(जयंती 12 जुलाई के अवसर पर)मुंबई, 12 जुलाई (वार्ता) भारतीय सिनेमा जगत में विमल रॉय को ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने सामाजिक सरोकारों, पारिवारिक मूल्यों और यथार्थवादी विषयों पर आधारित साफ-सुथरी फिल्मों के जरिए लगभग तीन दशक तक सिने प्रेमियों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। 12 जुलाई 1909 को ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) में जन्मे विमल रॉय के पिता जमींदार थे। पिता के निधन के बाद पारिवारिक विवाद के कारण उन्हें जमींदारी से बेदखल होना पड़ा और परिवार के साथ कोलकाता आना पड़ा। कोलकाता में उनकी मुलाकात फिल्मकार पी.सी. बरुआ से हुई, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें प्रचार सहायक के रूप में काम करने का अवसर दिया। बाद में न्यू थिएटर्स के प्रसिद्ध छायाकार नितिन बोस ने उन्हें सिनेमैटोग्राफर के रूप में काम करने का मौका दिया। इस दौरान उन्होंने ‘डाकू मंसूर’, ‘माया’ और ‘मुक्ति’ जैसी फिल्मों का छायांकन किया। वर्ष 1936 में प्रदर्शित पी.सी. बरुआ निर्देशित ‘देवदास’ उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई, जिसमें उन्होंने छायाकार के साथ सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया। फिल्म की सफलता ने उन्हें फिल्म जगत में नई पहचान दिलाई। वर्ष 1944 में विमल रॉय ने बंगाली फिल्म ‘उदयेर पाथे’ का निर्देशन किया। भारतीय समाज में व्याप्त वर्गभेद और सामाजिक असमानता पर आधारित इस फिल्म को जबरदस्त सफलता मिली। चालीस के दशक के अंत में न्यू थिएटर्स के बंद होने के बाद वह मुंबई आ गए और बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। इस दौरान अभिनेता अशोक कुमार ने उन्हें काफी सहयोग दिया।
वर्ष 1953 में प्रदर्शित ‘दो बीघा जमीन’ के साथ उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। उनकी प्रोडक्शन कंपनी का प्रतीक चिह्न मुंबई विश्वविद्यालय का राजाबाई टॉवर था। यह फिल्म उनके करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई और इसके बाद विमल रॉय तथा अभिनेता बलराज साहनी दोनों सफलता के शिखर पर पहुंच गए। ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने रिक्शाचालक शंभू महतो की यादगार भूमिका निभाई। रोचक तथ्य यह है कि इस किरदार के लिए विमल रॉय की पहली पसंद बलराज साहनी नहीं थे। वह पहले नासिर हुसैन, जसराज या त्रिलोक कपूर को लेना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि अत्यधिक शिक्षित बलराज साहनी ग्रामीण किसान की भूमिका प्रभावी ढंग से नहीं निभा पाएंगे। लेकिन बलराज साहनी ने अपनी मेहनत से इस धारणा को गलत साबित कर दिया। भूमिका को वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने कोलकाता की सड़कों पर लगभग 15 दिनों तक स्वयं रिक्शा चलाया और रिक्शाचालकों के जीवन को करीब से समझा। ‘दो बीघा जमीन’ आज भी भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ यथार्थवादी फिल्मों में गिनी जाती है। इसे कान फिल्म महोत्सव में अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला। फिल्म देखने के बाद महान अभिनेता-निर्देशक राज कपूर ने कहा था, “मैं यह फिल्म क्यों नहीं बना सका।”
विमल रॉय हमेशा फिल्म की पटकथा को सर्वोच्च महत्व देते थे। वर्ष 1954 में ‘विराज बहू’ के निर्माण के दौरान उन्होंने अभिनेत्री कामिनी कौशल से पूछा कि उन्होंने मूल उपन्यास कितनी बार पढ़ा है। जब उन्होंने जवाब दिया कि दो बार, तो विमल रॉय ने कहा, “बीस बार पढ़िए।” परिणामस्वरूप फिल्म में कामिनी कौशल के अभिनय की खूब सराहना हुई।
वर्ष 1955 में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित ‘देवदास’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। फिल्म की सफलता के बाद दिलीप कुमार ने कहा था, “मैंने फिल्म इंडस्ट्री में जितना अभिनय करना था, कर लिया।” वहीं वैजयंतीमाला ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार दिए जाने पर यह कहते हुए पुरस्कार स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि फिल्म में उनकी भूमिका मुख्य अभिनेत्री की थी। वर्ष 1959 में प्रदर्शित ‘सुजाता’ में विमल रॉय ने अस्पृश्यता जैसे गंभीर सामाजिक विषय को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया। फिल्म में नूतन ने अछूत कन्या की भूमिका निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया। वर्ष 1963 में प्रदर्शित ‘बंदिनी’ को भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म के निर्माण से पहले अभिनेता अशोक कुमार और विमल रॉय के बीच मतभेद हो गए थे और अशोक कुमार उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे। लेकिन नूतन के आग्रह पर उन्होंने फिल्म में अभिनय करने के लिए सहमति दी। यह फिल्म आज भी अपनी संपूर्णता, अभिनय और निर्देशन के लिए याद की जाती है।
हिंदी फिल्म उद्योग में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सबसे अधिक सात फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड लंबे समय तक विमल रॉय के नाम रहा। उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से कई नई प्रतिभाओं को भी अवसर दिया। गीतकार गुलजार ने ‘बंदिनी’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की, जबकि संगीतकार सलिल चौधरी को ‘दो बीघा जमीन’ की सफलता के बाद हिंदी सिनेमा में व्यापक पहचान मिली। विमल रॉय गुणवत्ता को संख्या से अधिक महत्व देते थे। यही कारण था कि लगभग तीन दशक के अपने फिल्मी करियर में उन्होंने करीब 30 फिल्मों का ही निर्माण और निर्देशन किया, लेकिन उनमें से अधिकांश आज क्लासिक फिल्मों की श्रेणी में शामिल हैं। निर्देशन के अलावा उन्होंने ‘महल’, ‘दीदार’, ‘नर्तकी’ और ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’ जैसी फिल्मों का संपादन भी किया। अपनी संवेदनशील और कालजयी फिल्मों से दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान बनाने वाले महान फिल्मकार विमल रॉय का 8 जनवरी 1965 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके पुत्र जॉय विमल रॉय ने उन पर 55 मिनट की एक वृत्तचित्र फिल्म का निर्माण किया।

