बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जिस तरह का राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा किया गया था, उस पर अब सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट मुहर लग चुकी है. शीर्ष अदालत ने न केवल एसआईआर प्रक्रिया को संवैधानिक और वैध ठहराया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की जांच, संशोधन और सत्यापन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है. ऐसे में अब इस मुद्दे पर अनावश्यक राजनीतिक भ्रम और अविश्वास फैलाने की कोशिशों पर विराम लगना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची को पारदर्शी, शुद्ध और अद्यतन बनाए रखने का पूरा अधिकार प्राप्त है. लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल मतदान कराने से नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने से भी तय होती है कि मतदाता सूची में केवल पात्र नागरिकों के नाम ही शामिल हों. यदि मतदाता सूची में फर्जी, मृत या अयोग्य व्यक्तियों के नाम बने रहते हैं, तो इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है.
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता और मतदाता सूची को अलग-अलग विषय माना. अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसने अपनी नागरिकता खो दी. यह केवल इतना दर्शाता है कि चुनाव आयोग संबंधित व्यक्ति की पात्रता या नागरिकता का सत्यापन नहीं कर पाया. यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि विपक्षी दलों और कुछ संगठनों द्वारा यह आशंका पैदा की जा रही थी कि एसआईआर प्रक्रिया नागरिकों को ‘गैर-नागरिक’ घोषित करने का माध्यम बन सकती है.
दरअसल, मतदाता सूची का शुद्धिकरण किसी भी लोकतंत्र की नियमित और आवश्यक प्रक्रिया है. भारत जैसे विशाल और गतिशील देश में जनसंख्या, पलायन, मृत्यु और निवास परिवर्तन लगातार होते रहते हैं. ऐसे में समय-समय पर विशेष पुनरीक्षण आवश्यक हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि विशेष परिस्थितियों में चुनाव आयोग विशेष प्रक्रिया अपना सकता है और यह संविधान का उल्लंघन नहीं माना जा सकता.
इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और अधिकार क्षेत्र पर लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया. जाहिर है कि कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को स्वतंत्र, निष्पक्ष और कानूनसम्मत माना है. अदालत ने 11 मान्य दस्तावेजों की सूची को भी उचित ठहराया और आधार को लेकर कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की.
लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता से भी मजबूत होता है. यदि चुनाव आयोग मतदाता सूची को साफ और पारदर्शी बनाने का प्रयास कर रहा है, तो इसे राजनीतिक संदेह के बजाय संस्थागत सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए. चुनाव सुधारों की दिशा में यह फैसला एक महत्वपूर्ण कदम है. दरअसल, अब आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल और नागरिक समाज इस मुद्दे को अनावश्यक विवाद का विषय बनाने के बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के रूप में देखें. बहरहाल,सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट कर देता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए शुद्ध मतदाता सूची अनिवार्य है. ऐसे में अब एसआईआर पर विवाद समाप्त होना ही लोकतंत्र के हित में होगा.
