भारत और चीन ; संतुलन का नया अध्याय

तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने एशिया की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है. करीब 50 मिनट तक चली यह बातचीत, जो निर्धारित समय से कहीं अधिक लंबी थी, इस बात का संकेत है कि दोनों देश पुराने विवादों की धुंध को पीछे छोडक़र भविष्य की दिशा में देखना चाहते हैं.यह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि एक गहरे कूटनीतिक संदेश से भरी हुई घटना थी. सात वर्षों बाद प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा और इस दौरान निर्मित सकारात्मक माहौल बताता है कि हाथी और ड्रैगन अब टकराव से ज्यादा सहयोग की जमीन तलाश रहे हैं.दरअसल, सच यह है कि 2020 की गलवान घाटी की झड़पों ने भारत-चीन संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया था. सीमा विवाद, विश्वास की कमी और चीन का आक्रामक रुख इन रिश्तों पर भारी पड़ता रहा. इसके साथ ही चीन से भारत का बढ़ता व्यापार घाटा लगातार चिंता का विषय बना. किंतु तियानजिन की बैठक ने यह दिखा दिया कि दोनों ही देश अब समझ चुके हैं कि टकराव किसी के हित में नहीं है. शी जिनपिंग का यह कहना कि हाथी और ड्रैगन को अच्छे पड़ोसी बनना होगा इस मानसिकता में बदलाव का संकेत है.इस बदलते परिदृश्य का एक और बड़ा कारण है अमेरिका. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल से ही अमेरिका ने चीन पर आर्थिक-रणनीतिक दबाव बढ़ाया. टैरिफ युद्ध, टेक कंपनियों पर रोक और इंडो-पैसिफिक में सैन्य गठजोड़ का विस्तार—इन कदमों ने बीजिंग को मजबूर किया कि वह अपनी नीति में लचीलापन लाए. दूसरी ओर, भारत पर भी दबाव बना कि वह हर मोर्चे पर वाशिंगटन के साथ खड़ा रहे. यह स्थिति भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौतीपूर्ण थी. यही कारण है कि नई दिल्ली और बीजिंग दोनों ही अब यह महसूस करने लगे हैं कि अमेरिकी दबाव से बचने और अपनी स्वतंत्र कूटनीति बनाए रखने के लिए आपसी संवाद आवश्यक है. तियानजिन की बैठक इसी सामरिक संतुलन की तलाश का हिस्सा है.

प्रधानमंत्री मोदी की हाल की जापान यात्रा को भी इस संदर्भ में देखना होगा. टोक्यो में मोदी ने एशियाई लोकतांत्रिक सहयोग पर जोर दिया और जापान के साथ मिलकर एशिया की नई आर्थिक-सुरक्षा धुरी पर काम करने का संकल्प जताया. यह संदेश साफ था कि भारत अपनी एशिया नीति को केवल चीन पर आधारित नहीं करेगा. जापान और भारत की नजदीकी चीन को असहज करती है, लेकिन ठीक इसी समय चीन से संवाद की पहल यह दिखाती है कि भारत दो ध्रुवों पर चलने की कला में माहिर हो चुका है. एक ओर अमेरिका-जापान के साथ रणनीतिक गठबंधन, तो दूसरी ओर चीन और रूस के साथ संतुलन—यही भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति है. बहरहाल, तियानजिन की बैठक को केवल बीते विवादों से आगे बढऩे की कोशिश नहीं, बल्कि एशिया के भविष्य का संकेत मानना चाहिए. हाथी और ड्रैगन अगर साथ चलते हैं तो न केवल सीमा पर शांति आएगी, बल्कि अमेरिका और यूरोप को भी यह संदेश जाएगा कि एशिया अपनी दिशा खुद तय कर सकता है. प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे एक साथ कई ध्रुवों पर खेलना जानते हैं. वे जापान में लोकतांत्रिक एशिया की बात करते हैं और चीन में सहयोग की भाषा. यही संतुलन भारत को न केवल एशिया, बल्कि वैश्विक राजनीति में निर्णायक शक्ति बना रहा है.

कुल मिलाकर तियानजिन का संवाद हाथी और ड्रैगन की नजदीकी का आरंभ है. यदि यह भरोसे की नई इमारत खड़ी कर पाया, तो एशिया में शक्ति संतुलन का एक नया अध्याय लिखा जाएगा.भारत के लिए यह कूटनीति केवल एक पड़ोसी से रिश्तों का सवाल नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में वैश्विक नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त करने वाली पहल है.

 

 

 

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