राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि का उद्घोष

संसद में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने “ऑपरेशन महादेव” और “ऑपरेशन सिंदूर” पर विस्तार से जानकारी दी, तो यह केवल सरकार की कार्रवाई का ब्योरा नहीं था, बल्कि यह भारत की बदलती राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि का उद्घोष था. कश्मीर के पहलगाम में निर्दोष नागरिकों की बर्बर हत्या, और उसके बाद सुरक्षाबलों की तेज़, लक्षित और निर्णायक प्रतिक्रिया,इन दोनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब भारत आतंकवाद के प्रति “सहानुभूति नहीं, सि$र्फ प्रतिशोध” की नीति पर चल रहा है.

पहलगाम में हुई नृशंस हत्याएं किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य थीं. धर्म पूछकर नागरिकों को उनके परिवार के सामने गोलियों से भून देना, यह आतंक का वह चेहरा है जो मानवता को चुनौती देता है. भारतीय सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस की त्वरित और सटीक कार्रवाई में लश्कर-ए-तैयबा के तीन ए-ग्रेड आतंकियों,सुलेमान उर्फ फैजल, अफगान और जिबरान को ढेर कर दिया गया. यह न केवल सटीक खुफिया तंत्र का परिणाम था, बल्कि यह एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रमाण भी है.

ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, वह भारत की संप्रभुता और आत्मरक्षा के अधिकार का सशक्त प्रयोग था. पाकिस्तान स्थित 9 आतंकी अड्डों पर जब भारतीय बलों ने 7 मई को दोपहर के 20 मिनट में कहर बरपाया, तो यह स्पष्ट कर दिया गया कि भारत अब हमलों का इंतज़ार नहीं करता, वह खतरे के स्रोत तक जाकर प्रहार करता है. अमित शाह द्वारा दी गई यह जानकारी कि पाकिस्तान के नागरिकों को नुकसान नहीं पहुंचाया गया, यह भी दर्शाता है कि यह बदले की नहीं, बल्कि न्याय की कार्रवाई थी.

यह कार्यवाई अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को नैतिक रूप से और मज़बूत बनाती है, क्योंकि यह एक संप्रभु राष्ट्र द्वारा आत्मरक्षा के अधिकार का सीमित, सटीक और जिम्मेदार उपयोग था. डीजीएमओ स्तर की संवाद प्रक्रिया ने भारत की इस नैतिकता को और मज़बूत किया.

गृह मंत्री का यह कहना कि “जब आतंकियों के मारे जाने की खबर आई, तो विपक्ष खुश नहीं हुआ, यह केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं है, यह एक गहरा प्रश्न है. क्या आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भी हम विभाजित रहेंगे? पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बयान कि “क्या सबूत है कि ये आतंकी पाकिस्तान से आए थे?” न केवल देशवासियों को विचलित करता है, बल्कि यह उस राजनीति की ओर भी संकेत करता है जिसमें राष्ट्र की सुरक्षा से ज्यादा अहम विपक्ष की असहमति हो जाती है.

अमित शाह का यह दावा कि आतंकियों के पास से पाकिस्तान निर्मित वस्तुएं, वोटर आईडी जैसे प्रमाण मिले हैं . इसके बाद भी 130 करोड़ नागरिक इन विरोधाभासों को देख रहे हैं, और आने वाले समय में इसका मूल्यांकन भी करेंगे.

ऑपरेशन महादेव और ऑपरेशन सिंदूर भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में मील के पत्थर हैं. यह साबित करता है कि सुरक्षा बलों को जब राजनीतिक समर्थन और पूरी स्वतंत्रता मिलती है, तो वे अद्वितीय परिणाम दे सकते हैं. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा केवल गोलियों से नहीं, राजनीतिक एकजुटता से भी सुरक्षित होती है. इस मोर्चे पर विपक्ष की भूमिका निराशाजनक रही है.

सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की जि़म्मेदारी है कि वे आतंकवाद जैसे सवालों पर राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र की बात करें. जब मां अपने बेटे को खोती है, जब नवविवाहिता विधवा होती है,तब पार्टी नहीं, केवल देश होता है. यही भावना अगर संसद में हो, तो ‘ऑपरेशन महादेव’ और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मिशन सि$र्फ सैन्य विजय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गर्व बन जाएंगे.

 

 

 

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