चुनाव आयोग का हलफनामा, 11 दस्तावेजों की सूची से आधार कार्ड को बाहर रखने का किया बचाव

नयी दिल्ली, 21 जुलाई (वार्ता) बिहार मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण विवाद मामले में चुनाव आयोग ने सोमवार उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखा।

आयोग ने अपने 88 पन्नों के हलफनामे में आधार कार्ड को 11 दस्तावेजों की सूची से बाहर रखने का बचाव करते हुए कहा है कि यह अनुच्छेद 326 के तहत मतदाता की पात्रता की जांच में मदद नहीं करता है। साथ ही 11 दस्तावेजों की सूची के बारे में कहा है कि यह संपूर्ण नहीं केवल सांकेतिक है।

चुनाव आयोग ने दावा करते हुए कहा है कि बिहार मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण के सिलसिले में 90 फीसदी मतदाता पहले ही गणना फॉर्म जमा कर चुके हैं।

चुनाव आयोग ने यह भी दावा किया है कि मतदाता सूची से किसी को भी वंचित न किया जाए। यह सुनिश्चित करने के अलावा कमजोर वर्ग के लोगों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उसका कहना है कि विशेष अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची की विश्वसनीयता में जनता का विश्वास बहाल करना है।

चुनाव आयोग का कहना है कि पहली बार सभी राजनीतिक दल इतने बड़े पैमाने पर गहन पुनरीक्षण कार्य में शामिल हुए हैं। प्रत्येक पात्र मतदाता तक पहुंचने के लिए 1.5 लाख से अधिक बीएलए नियुक्त किए हैं।

चुनाव आयोग ने हलफनामे में कहा, “मतदान का अधिकार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16 और 19 के साथ अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 62 से प्राप्त होता है, जिसमें नागरिकता, आयु और सामान्य निवास के संबंध में कुछ योग्यताएँ निर्धारित हैं। एक अपात्र व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं है। इसलिए, वह (याचिकाकर्ता)इस संबंध में अनुच्छेद 19 और 21 के उल्लंघन का दावा नहीं कर सकता।”

शीर्ष अदालत ने 10 जुलाई को बिहार मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर 21 जुलाई या उससे पहले अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की अंशकालीन कार्य दिवस पीठ ने कांग्रेस समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश पारित किया।

शीर्ष अदालत ने तब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख मुकर्रर की थी।

पीठ ने संबंधित पक्षों की दलीलें विस्तार पूर्वक सुनने के बाद अपने निर्देश में कहा था, “मामले की सुनवाई जरुरी है। इसे 28 जुलाई को उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। उससे एक सप्ताह पहले या 21 जुलाई को हलकनामा दाखिल किया जाए।”

विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के संबंध में चुनाव आयोग के 24 जून-2025 को जारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इसे (आदेश को) अव्यावहारिक और मनमाना बताते हुए रद्द करने की मांग शीर्ष अदालत से की गई। ये मांग करते हुए कांग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, राष्ट्रीय जनता दल सांसद मनोज कुमार झा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सांसद सुप्रिया सुले, सीपीआई के महासचिव डी राजा, शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत, झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद सरफराज अहमद और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य ने याचिका दायर की है।

इसी प्रकार गैर सरकारी संगठनों – एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीयूसीएल और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव समेत अन्य ने इस संबंध में चुनाव आयोग के फैसले की वैधता को शीर्ष अदालत में चुनौती देते हुए अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।

चुनाव आयोग के उक्त आदेश के खिलाफ याचिका दायर करने वालों ने दावा किया कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 21ए के प्रावधानों का उल्लंघन है।उन्होंने तर्क दिया कि यदि इस आदेश को रद्द नहीं किया गया तो मनमाने ढंग से और उचित प्रक्रिया के बिना लाखों मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को चुनने से वंचित किया जा सकता है। इससे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र बाधित हो सकता है, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं।

 

 

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