सैफ अली, शर्मिला सहित अन्य को हाईकोर्ट से झटका

जबलपुर: भोपाल रियासत के अंतिम नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की संपति के उत्तराधिकार के संबंध में ट्रायल कोर्ट द्वारा साल 2000 में पारित आदेश को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देशित किया है कि उत्तराधिकारी विवाद की सुनवाई नये सिरे की जाये। एकलपीठ ने मामले की सुनवाई एक साल की निर्धारित समय अवधि में करने के आदेश जारी किये है।

जिला न्यायाधीश भोपाल के द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध बेगम सुरैया रशीद,बेगम मेहर ताज नवाब साजिदा सुल्तान, नवाबजादी कमर ताज राबिया सुल्तान, नवाब मेहर ताज साजिदा सुल्तान एवं अन्य की तरफ से साल 2000 में दो अपील हाईकोर्ट में दायर की गयी थी। अपील में कहा गया था कि भोपाल रियासत का भारत संघ में विलय 30 अप्रैल 1949 में हुआ था। लिखित समझौते के तहत. विलय के बाद नवाब के विशेष अधिकार जारी रहेंगे और निजी संपत्ति के पूर्ण स्वामित्व गद्दी (सिंहासन) का उत्तराधिकार भोपाल सिंहासन उत्तराधिकार अधिनियम 1947 के तहत होंगे।

नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की मृत्यु के बाद साजिदा सुल्तान को नवाब घोषित किया था। भारत सरकार ने 10 जनवरी 1962 को पत्र जारी की संविधान के अनुच्छेद 366 (22) के तहत व्यक्तिगत संपत्ति का उल्लेख निजी संपत्ति के रूप में किया था। भारत सरकार का आदेश विधिसम्मत नहीं है, क्योंकि नवाब मोहम्मद हमीदुल्ला खान की मृत्यु के पश्चात उनकी निजी संपत्ति का बंटवारा मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार वादीगण और प्रतिवादियों के बीच होना चाहिए था। जिला न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय पारित निर्णय के आधार पर उनका आवेदन खारिज कर दिया था।

एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के अन्य पहलुओं पर विचार किए बिना एआईआर 1997 (मिस तलत फातिमा हसन बनाम हिज हाइनेस नवाब सैयद मुर्तजा अली खान साहिब बहादुर और अन्य) में रिपोर्ट किए गए फैसले पर भरोसा करते हुए मुकदमों को खारिज कर दिया, लेकिन इस तथ्य पर विचार करने में विफल रहा कि बाद में इसे (2020) में रिपोर्ट किए गए एक मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया था। विचाराधीन मुकदमे विभाजन के हैं, इसलिए, सीपीसी के आदेश 14 नियम 23 ए के प्रावधान के मद्देनजर, मेरी राय है कि इन मामलों को नए सिरे से तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में वापस भेजा जाता है। ट्रायल कोर्ट बदली हुई कानूनी स्थिति के मद्देनजर पक्षों को सबूत पेश करने की अनुमति दे सकता है।

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