महंगी शिक्षा: निजी स्कूलों की मनमानी; बढ़ती फीस से शिक्षा दूर, मध्यम व निम्न वर्ग परेशान

इंदौर:महंगाई की मार झेल रहे मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए शिक्षा का बढ़ता खर्च एक नई चुनौती बन चुका है. वर्ष 2025 का नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है,नए एडमिशन भी करीब-करीब हो चुके हैं, लेकिन अभिभावकों की चिंता कम होने का नाम नहीं ले रही. निजी स्कूलों की लगातार बढ़ती फीस और शासन की निष्क्रियता ने शिक्षा को आमजन की पहुँच से दूर कर दिया है. इससे न केवल बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ भी गहराती जा रही हैं.
निजी स्कूल फीस में बढ़ती वृद्धी के लिए कई बार आंदोलन किए गए. कुछ पालकों ने तो आवेदन, निवेदन करते हुए राज्य शासन को ज्ञापन भी सौंपे लेकिन हमेशा शासन की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिला. आज तक निजी स्कूल फीस में कमी नहीं हो पाई जिसके बाद स्कूल संचालकों ने अपने तेवर बदलते हुए और मनमानियां शुरू कर दी है. हर बार एक नया स्कूल प्रदेश में दिखाई देता है. पालकों की जेब से पैसा निकालने के लिए निजी स्कूलों नए-नए प्रयोग करते हैं. महंगाई झेलने वाले आम नागरिक महंगी पढ़ाई के चलते अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते.

प्रदेश के आलावा शहर की बात करें तो एक जानकारी के अनुसार छोटे बड़े मिलाकर तकरीबन 1684 निजी स्कूल है और करीब पैतीस हज़ार बच्चे शिक्षा लेते है. अब वर्ग और जनसंख्या का लगाना तो मुश्किल होगा लेकिन यहां तक साफ है कि चालीस प्रतिशत पालक गण मध्यम वर्ग से ही हैं. वहीं तीस प्रतिशन गरीब और निम्न वर्ग से हैं. बाकी तीस प्रतिशत ही ऐसे लोग है जिन्हें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा देने में कोई बाधा नहीं होती लेकिन राज्य शासन को इन सत्तर प्रतिशत वर्ग को देखना होगा, जो शहर प्रदेश एवं देश का हिस्सा है.
इनका कहना है
उच्च शिक्षा नहीं होगी तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी. अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी तो जीवन का स्तर नहीं बढ़ेगा. जीवन में कई तरह की सुविधा होगी. आम आदमी उच्च शिक्षा के लिए इतना पैसा कहां से लाए.
रेहान खान
राज्य शासन द्वारा कई नियम बनाए जाते हैं लेकिन निजी स्कूलों की फीस को लेकर सख्त नियम नहीं बनाए जाएंगे, जबकि शिक्षा का अधिकार का प्रचार जोरों पर किया जाता है. अब शिक्षा में भी भेदभाव हो गया.
रिंकू पिपले, सदस्य जागरूक उपभोक्ता समिति
सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारें. निजी स्कूलों फीस पर लगाम लगाई जाए. एक नीति लागू की जाए जिसमें जितने भी सरकारी कर्मचारी हैं. उनके बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने की अनिवार्यता जारी कर दी जाए.
अमित सिकरवाल, गंगापुत्र समाजसेवी

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