आठ लाख की पुलिया दो महीने में ढही

सिंगरौली । सरकारी निर्माण में गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी के दावों की पोल ग्राम पंचायत घोघरा में खुलती नजर आ रही है। दरअसल मुन्ना साकेत के घर के पास 15वें वित्त आयोग से करीब 7 लाख 98 हजार रुपये की लागत से निर्मित पुलिया निर्माण पूरा होने के महज दो माह के भीतर धराशायी हो गई। कार्य जून माह में पूर्ण बताया जा रहा है और सितंबर में पुलिया के ध्वस्त होने से निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस कार्य में अब तक 6 लाख 38 हजार 742 रुपये की राशि आहरित की जा चुकी है। पुलिया का इतनी कम अवधि में ढह जाना महज सामान्य तकनीकी खामी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सवाल सीधे तौर पर निर्माण की गुणवत्ता, इस्तेमाल की गई सामग्री और तकनीकी निगरानी पर है। स्थानीय स्तर पर निर्माण में कथित कमीशनखोरी और मानकों की अनदेखी के आरोप भी उठ रहे हैं। अब यह जांच का विषय है कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद बनाई गई पुलिया आखिर दो महीने भी क्यों नहीं टिक सकी। वहीं सबसे बड़ा सवाल संबंधित सब इंजीनियर और तकनीकी अमले की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। निर्माण के दौरान स्थल का कितनी बार निरीक्षण किया गया, बेस की गहराई कितनी रखी गई, प्राक्कलन में कितनी गहराई निर्धारित थी, सरिया और कांक्रीट का कितना उपयोग होना था और वास्तविकता में कितना हुआ, इन सवालों का जवाब मौके की जांच से ही सामने आएगा। यदि निर्माण के दौरान नियमित तकनीकी निरीक्षण हुआ था तो फिर महज दो महीने में पुलिया के ढहने की नौबत क्यों आई और यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो माप पुस्तिका में निर्माण का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया। फिलहाल उक्त ध्वस्त पुलिया की जांच कराए जाने की मांग कई स्थानीय ग्रामीणों ने कलेक्टर के साथ-साथ मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत सिंगरौली से की है।

चेकडैम और पुलियाओं की भी हो जांच

घोघरा में केवल इसी पुलिया तक जांच सीमित रखने के बजाय ग्राम पंचायत क्षेत्र में हाल के वर्षों में कराए गए पुलिया, चेकडैम और अन्य निर्माण कार्यों की भी तकनीकी जांच कराने की मांग उठ रही है। विशेष रूप से उन कार्यों की जांच जरूरी है जो कम समय में क्षतिग्रस्त हुए हैं। अब सवाल यह नहीं है कि पुलिया क्यों ढही, बल्कि सवाल यह है कि जब निर्माण की निगरानी और मूल्यांकन के लिए तकनीकी अमला मौजूद था, तब घटिया या कमजोर निर्माण की स्थिति सामने क्यों नहीं आई? यदि स्थल निरीक्षण और मापदंडों की जांच समय पर हुई होती तो सरकारी धन की यह दुर्दशा शायद सामने ही नहीं आती। अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि आरोपों की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराकर दोषी की जिम्मेदारी तय करे। जांच में यदि प्राक्कलन, वास्तविक निर्माण और भुगतान के बीच कोई अंतर सामने आता है तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी जरूरी होगी।

दफ्तर में बैठकर मूल्यांकन करने के आरोप

स्थानीय स्तर पर लंबे समय से आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ तकनीकी अधिकारी मौके पर पर्याप्त निरीक्षण किए बिना ही पंचायतों के चेकडैम, पुलिया और तालाब जैसे निर्माण कार्यों का मूल्यांकन कर देते हैं। घोघरा की पुलिया के मामले में भी यही हुआ या नहीं, इसका पता माप पुस्तिका, निरीक्षण पंजिका और स्थल की तकनीकी जांच से लगाया जा सकता है। पूर्व में पदस्थ जिपं सीईओ के कार्यकाल को लेकर भी तकनीकी अमले को कथित संरक्षण दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं। आरोप यह भी रहे कि कुछ सब इंजीनियर और इंजीनियर कार्यालय से ही निर्माण कार्यों का मूल्यांकन कर देते थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन वर्तमान पुलिया प्रकरण ने इस पूरी कार्यप्रणाली पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इधर पुलिया के ध्वस्त हिस्से की तकनीकी जांच कराकर बेस की गहराई, कांक्रीट की गुणवत्ता, सरिया की मात्रा की जांच हो।

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