आईआईटी बॉम्बे में 22 वर्षीय छात्र साहिल वाकोड़े की मौत ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा किया है, जिससे बचना संभव नहीं है. एक प्रतिभाशाली युवा की जिंदगी का इस तरह असमय समाप्त हो जाना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के लिए भी गंभीर चेतावनी है, जिसमें सफलता को अक्सर अंकों, ग्रेड और परीक्षा परिणामों से ही मापा जाता है. इस घटना की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के सामने आने की प्रतीक्षा जरूरी है, लेकिन इससे जुड़े व्यापक सवालों पर चर्चा अभी से होनी चाहिए.
आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश स्वयं एक कठिन प्रतिस्पर्धा के बाद मिलता है. इसके बाद कठिन पाठ्यक्रम, लगातार परीक्षाएं, असाइनमेंट, ग्रेड और भविष्य के करियर की चिंता छात्रों पर निरंतर दबाव बनाए रखती है. ऐसी परिस्थितियों में एक परीक्षा में हुई गलती या अनुशासनात्मक कार्रवाई का भय किसी छात्र के लिए असामान्य रूप से भारी पड़ सकता है. इसका अर्थ यह नहीं कि परीक्षा की शुचिता या अनुशासन से समझौता किया जाए. आवश्यकता इस बात की है कि अनुशासन और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाया जाए.शिक्षा व्यवस्था को यह समझना होगा कि विद्यार्थी केवल रोल नंबर या ग्रेड नहीं हैं. उनसे गलती हो सकती है, वे तनाव में आ सकते हैं और उन्हें असफलता से उबरने के अवसर की आवश्यकता होती है. परीक्षा प्रणाली में लगातार मूल्यांकन के साथ तनाव कम करने की व्यवस्था, नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श, प्रशिक्षित काउंसलरों की उपलब्धता और संकट की स्थिति में तत्काल सहायता तंत्र को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए. हॉस्टल स्तर पर ऐसी व्यवस्था हो, जहां विद्यार्थी बिना भय अपनी परेशानी साझा कर सकें. शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों को भी संवेदनशील संवाद के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
इस घटना का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इसे केवल राजनीति या जातिवाद के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा. परिजनों द्वारा लगाए गए आरोप गंभीर हैं और उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. यदि किसी स्तर पर लापरवाही, दबाव या अनुचित व्यवहार सामने आता है तो जवाबदेही तय होना चाहिए. लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना भी न्यायसंगत नहीं होगा. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप या जातिगत विमर्श यदि मूल घटना और उसके कारणों पर पर्दा डाल दें, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान छात्रों और शिक्षा व्यवस्था के सुधार का होगा.
आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों से केवल उत्कृष्ट इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करने की अपेक्षा नहीं है. उनसे ऐसा वातावरण बनाने की भी अपेक्षा है, जहां उत्कृष्टता की दौड़ में मानवीय संवेदना पीछे न छूटे. परीक्षा की ईमानदारी जरूरी है, अनुशासन जरूरी है, लेकिन विद्यार्थी का मानसिक स्वास्थ्य और जीवन सर्वोपरि है. साहिल की मौत की जांच अपने निष्कर्ष तक पहुंचे, दोषी हो तो कार्रवाई हो और निर्दोष को अनावश्यक आरोपों से बचाया जाए. साथ ही यह घटना शिक्षा व्यवस्था को आत्ममंथन का अवसर दे. ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें परीक्षा कठिन हो सकती है, प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है, लेकिन जीवन को कठिन बनाने वाली परिस्थितियों में छात्र अकेला न रह जाए. शिक्षा का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है, उसे परीक्षा के दबाव में खत्म कर देना नहीं.
