दो दशकों में केवल तीन बार हुए छात्र संघ चुनाव, प्रत्यक्ष प्रणाली 2003 से बंद

सतना: प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया लंबे समय से हाशिए पर है. प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है. पिछले दो दशकों का रिकॉर्ड देखें तो साफ होता है कि छात्र राजनीति को दिशा देने वाली चुनावी प्रक्रिया लंबे समय तक बंदिशों और अनिश्चितताओं के साए में रही है. वर्ष 2003 के बाद से प्रदेश में प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली पर पूरी तरह विराम लगा हुआ है. हाल ही प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी अभी तक प्रदेश सरकार का कोई निर्णय सामने नहीं आया कि आख़िर कब तक छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी अभी तक कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हुए हैं जिसके कारण छात्र संगठनों में रोष भी व्याप्त है.

2003 के बाद थमा प्रत्यक्ष मतदान का दौर

प्रदेश के कॉलेजों में अंतिम बार बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष चुनाव वर्ष 2003 में आयोजित हुए थे. उस दौरान लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और कैंपस में कानून-व्यवस्था की चिंताओं का हवाला देते हुए प्रत्यक्ष प्रणाली को बंद कर दिया गया था. इसके बाद से छात्रों द्वारा सीधे अपने अध्यक्ष और पदाधिकारियों को चुनने का अधिकार छिन गया.

2011 और 2012 में जगी थी उम्मीद, फिर लग गया ब्रेक

लगभग आठ साल के लंबे अंतराल के बाद 2011 और 2012 में छात्र संघ चुनावों की वापसी हुई. मेरिट और आंशिक चुनावी प्रक्रिया के जरिए छात्र प्रतिनिधियों को चुना गया, जिससे कैंपस में संगठनात्मक सक्रियता लौटी. हालांकि, यह बहाली ज्यादा दिन नहीं टिक सकी और 2012 के बाद प्रशासन ने एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

2017 में अप्रत्यक्ष प्रणाली का प्रयोग, उसके बाद सन्नाटा

पांच साल के सूखे के बाद वर्ष 2017 में सरकार ने अप्रत्यक्ष प्रणाली से छात्र संघ चुनाव कराए. इसमें पहले कक्षा प्रतिनिधियों (सीआर) का चुनाव हुआ और फिर उन्होंने मिलकर कॉलेज स्तर के पदाधिकारियों को चुना. कई छात्र संगठनों ने इस प्रणाली को सत्ता के प्रभाव वाला बताते हुए विरोध भी जताया. इसके बावजूद उम्मीद थी कि चुनाव नियमित होंगे लेकिन 2017 के बाद से आज तक प्रदेश के किसी भी कॉलेज में छात्र संघ चुनाव नहीं कराए गए हैं.

वही 2018 से अब तक प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनाव पूरी तरह ठप.विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को राज्य और देश की राजनीति की प्रारंभिक नर्सरी माना जाता है. छात्र संगठनों का कहना है कि चुनाव न होने से युवाओं में नेतृत्व क्षमता का विकास रुक गया है और छात्र हितों की समस्याओं जैसे फीस वृद्धि, हॉस्टल की बदहाली और परीक्षाओं की अनियमितता को उठाने वाला कोई आधिकारिक मंच नहीं बचा है.

इनका कहना
अभी तक छात्र संघ चुनाव को लेकर हमारे पास कोई आदेश नही आया है.

डॉ आर एस गुप्ता
प्राचार्य डिग्री कॉलेज

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