
जबलपुर। हाईकोर्ट ने प्रोबेशन अवधि में कर्मचारियों को 70, 80 और 90 प्रतिशत वेतन देने की राज्य सरकार की व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने कहा कि जब कर्मचारी से पूरा काम लिया जा रहा है तो उसे भर्ती नियमों के अनुसार निर्धारित पूरा वेतन देने से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त संबंधित कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के काम के लिए पूर्ण वेतन देने के निर्देश दिए हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि पीएससी के माध्यम से नियुक्त अधिकारियों को प्रारंभ से पूरा वेतन और ईएसबी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को कम वेतन देना समानता के अधिकार के विपरीत है। यह संविधान के अनुच्छेद 12 और 14 का उल्लंघन है। राज्य सरकार ने दिसंबर 2019 में ईएसबी के माध्यम से होने वाली भर्तियों में चार वर्ष की प्रोबेशन अवधि निर्धारित की थी। इसके तहत पहले वर्ष 70, दूसरे वर्ष 80, तीसरे वर्ष 90 और चौथे वर्ष से 100 प्रतिशत वेतन देने का प्रावधान किया गया था। सरकार ने यह व्यवस्था 25 नवंबर 2019 के मेमो के जरिए लागू की थी। कोर्ट ने कहा कि मंत्रिपरिषद का ऐसा निर्णय, जिसके आधार पर कर्मचारियों के वेतन में कटौती की गई, कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं है। भर्ती नियमों में निर्धारित पे-स्केल से कम वेतन देने का प्रावधान नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी के विरुद्ध कदाचार या गलत आचरण साबित होने पर नियमानुसार दंड दिया जा सकता है, लेकिन निर्धारित पे-स्केल से नीचे वेतन नहीं किया जा सकता। नियमों के तहत इंक्रीमेंट रोकने या कर्मचारी को निचले पे-स्केल में भेजने जैसी कार्रवाई संभव है, लेकिन न्यूनतम निर्धारित वेतन से कम भुगतान का प्रावधान नहीं है। कोर्ट के इस आदेश से प्रदेश में 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त हजारों कर्मचारियों को आर्थिक राहत मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
