नई दिल्ली। भारत और आसियान देशों के बीच कृषि सहयोग तीन दशक से अधिक समय से शोध, प्रशिक्षण और मैदानी कार्यक्रमों के जरिए आगे बढ़ रहा है। नई दिल्ली में 9 सितम्बर को होने वाली 9वीं आसियान-भारत कृषि एवं वानिकी मंत्रिस्तरीय बैठक (AIMMAF) और उससे एक दिन पहले होने वाली 10वीं आसियान-भारत कृषि एवं वानिकी कार्य समूह (AIWGAF) की बैठक इस सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करेगी। अब जरूरत इस बात की है कि संस्थागत संवाद और शोध से आगे बढ़कर इसका सीधा लाभ किसानों, ग्रामीण समुदायों और खाद्य प्रणालियों तक पहुंचे।
भारत और आसियान के 11 सदस्य देशों, जिनमें अक्टूबर 2025 में शामिल हुआ तिमोर-लेस्ते भी है, की कृषि परिस्थितियों में कई समानताएं हैं। आसियान के कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र करीब 9.3 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराते हैं, जबकि भारत की कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों से लगभग 46 प्रतिशत कार्यबल जुड़ा है। दोनों क्षेत्रों में छोटे और बिखरे खेत, मानसून पर निर्भरता तथा जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव प्रमुख साझा चुनौतियां हैं।
चावल, दलहन, फल, मसाले, पशुधन, मत्स्य, मैंग्रोव और वन जैसे क्षेत्र दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं। जलवायु परिवर्तन, पौधों एवं पशुओं में फैलने वाले सीमा-पार रोग-कीट तथा फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान भी साझा चिंताएं हैं। यही समानताएं कृषि तकनीक और ज्ञान के आदान-प्रदान की व्यापक संभावनाएं पैदा करती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में भारत-आसियान मध्यम अवधि की कार्ययोजना 2026-2030 महत्वपूर्ण है। यह आसियान की खाद्य, कृषि एवं वानिकी क्षेत्रीय योजना 2026-2030 के छह प्रमुख क्षेत्रों—स्थिरता, कार्बन उत्सर्जन में कमी, खाद्य सुरक्षा, व्यापार संपर्क, डिजिटल नवाचार और टिकाऊ वन प्रबंधन—से जुड़ी है।
भारत के कृषि शोध तंत्र की बड़ी क्षमता
भारत अपने विशाल सार्वजनिक कृषि अनुसंधान एवं विस्तार तंत्र के जरिए इस साझेदारी में महत्वपूर्ण विशेषज्ञता उपलब्ध करा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत 114 शोध संस्थान एवं ब्यूरो, 80 कृषि विश्वविद्यालय और 731 जिला स्तरीय कृषि विज्ञान केन्द्र कार्यरत हैं। पिछले 12 वर्षों में इस नेटवर्क ने 3,800 से अधिक फसल किस्में जारी की हैं, जिनमें करीब 3,100 जलवायु अनुकूलन क्षमता वाली और लगभग 200 बेहतर पोषण गुणों वाली किस्में हैं। देश का राष्ट्रीय जीन बैंक करीब 4.70 लाख आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण करता है।
भारत की कृषि प्रगति उत्पादन के आंकड़ों में भी दिखाई देती है। खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के करीब 252 मिलियन टन से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 377 मिलियन टन हो गया है। इसी अवधि में दूध उत्पादन लगभग 146 मिलियन टन से बढ़कर 248 मिलियन टन तक पहुंच गया। मत्स्य उत्पादन भी पिछले दशक में लगभग दोगुना होकर करीब 20 मिलियन टन हो गया है, जिससे अनुमानित तीन करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी है।
शोध से खेत तक पहुंच बनाने की जरूरत
आसियान-भारत सहयोग की अहम उपलब्धियों में मानव संसाधन विकास और कृषि विस्तार भी शामिल हैं। आसियान-भारत फेलोशिप कार्यक्रम के माध्यम से सदस्य देशों के विद्यार्थी भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर अध्ययन कर रहे हैं। इससे उन्हें क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े शोध और विशेषज्ञता का अवसर मिलता है।
भारत के अपने कृषि विस्तार कार्यक्रम भी बड़े पैमाने पर ज्ञान को किसानों तक पहुंचाने की क्षमता दिखाते हैं। ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ 13.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंचा और शोध एवं नीति के लिए 500 से अधिक प्राथमिकता वाले मुद्दों की पहचान की गई। संबंधित जनसंपर्क एवं प्रशिक्षण गतिविधियों के तहत 1.34 लाख से अधिक कार्यक्रम, 6,650 से अधिक प्रशिक्षण सत्र और एक लाख से अधिक मैदानी प्रदर्शन 728 जिलों में आयोजित किए गए। डिजिटल माध्यमों से करीब पांच करोड़ हितधारकों तक पहुंच बनाई गई।
इन अनुभवों को आसियान के छोटे और सीमांत किसानों की जरूरतों के अनुरूप अपनाया जा सकता है। इसके लिए मंत्रालयों और शोध संस्थानों के बीच संवाद से आगे बढ़कर सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय कृषि विस्तार नेटवर्क को साझेदारी में शामिल करना जरूरी होगा।
2026-30 में परिणामों पर हो फोकस
सहयोग के सात प्रमुख क्षेत्र—खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, टिकाऊ वानिकी एवं मैंग्रोव प्रबंधन, पुनर्योजी एवं जलवायु अनुकूल कृषि, पशुधन एवं डेयरी, पशु स्वास्थ्य, मत्स्य एवं ब्लू इकोनॉमी, फसल कटाई बाद प्रबंधन एवं मूल्य श्रृंखला तथा डिजिटल कृषि—आगे की साझेदारी के लिए मजबूत आधार उपलब्ध कराते हैं।
अगला कदम संयुक्त रूप से बहु-स्थानिक परीक्षण, जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों का आसियान परिस्थितियों में परीक्षण, साझा कीट निगरानी व्यवस्था और फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान के आकलन के लिए समान पद्धति विकसित करना हो सकता है। मत्स्य और वानिकी से जुड़े समुदायों तक भी सहयोग का लाभ सीधे पहुंचाने की आवश्यकता है।
9वीं AIMMAF की सफलता का आकलन केवल संयुक्त वक्तव्य की भाषा से नहीं, बल्कि बैठक के बाद सामने आने वाले ठोस परिणामों से होना चाहिए। 2026-2030 की कार्ययोजना के दौरान यह देखा जाना चाहिए कि कितनी भारतीय फसल किस्मों का आसियान देशों में परीक्षण और उपयोग हुआ, कितने फेलोशिप प्राप्तकर्ता अपने देशों की कृषि व्यवस्था को मजबूत करने लौटे और संयुक्त कीट निगरानी एवं फसल कटाई बाद प्रबंधन की व्यवस्थाएं वास्तव में कितनी प्रभावी हुईं।
आसियान-भारत कृषि साझेदारी की वास्तविक सफलता नई दिल्ली की बैठकों में नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में खेतों, प्रयोगशालाओं और ग्रामीण समुदायों में दिखाई देगी—जहां इसका असर किसानों की आय, उत्पादकता, आजीविका और जलवायु लचीलापन बढ़ाने के रूप में सामने आएगा।
