जबलपुर: शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए नई इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर उतर गई हैं, लेकिन इनके लिए बनाए गए बस स्टॉप अब भी अपनी बदहाली की कहानी कह रहे हैं। यात्रियों की सुविधा और सुरक्षित आवागमन के उद्देश्य से निर्धारित बस स्टॉप कई जगह अतिक्रमण और अव्यवस्था की चपेट में हैं। कहीं स्टॉप की जगह पर कब्जा है तो कहीं दुकानदारों और अस्थायी कारोबारियों ने यात्रियों के खड़े होने तक की जगह घेर रखी है। ऐसे में नई और चमचमाती इलेक्ट्रिक बसें तो आधुनिक शहर की तस्वीर दिखा रही हैं, लेकिन उनके इंतजार में खड़े यात्री पुराने ढर्रे की परेशानियों से जूझने को मजबूर हैं।
व्यापार का बना अड्डा
बस स्टॉप के लिए सुरक्षित की गई जगह भी चाट-फुल्की और अन्य ठेलों के काम आ रही है। शाम होते ही कई स्थानों पर स्टॉप के आसपास ठेले सज जाते हैं और देखते ही देखते यात्रियों के लिए निर्धारित स्थान छोटा पड़ जाता है। बस आने पर यात्रियों को सड़क के किनारे या वाहनों के बीच खड़े होकर बस का इंतजार करना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग यात्रियों को होती है। कई जगह बस को निर्धारित स्थान पर रोकने के बजाय सड़क पर ही सवारी उतारनी-चढ़ानी पड़ती है, जिससे पीछे चल रहे वाहनों को भी ब्रेक लगाना पड़ता है और यातायात प्रभावित होता है। यानी बसें इलेक्ट्रिक हो गईं, लेकिन स्टॉप की व्यवस्था अब भी अतिक्रमण के पुराने प्लग में फंसी हुई नजर आती है।
यात्रियों के काम नहीं आ रही जगह
शहर को इलेक्ट्रिक बसों के साथ आधुनिक और सुरक्षित बस स्टॉप की भी जरूरत है। सिर्फ नई बसें खरीद लेने से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था स्मार्ट नहीं बन सकती, जब तक यात्रियों के लिए निर्धारित स्टॉप वास्तव में यात्रियों के ही काम न आएं। संबंधित विभागों को बस स्टॉप की जमीन चिह्नित कर वहां से स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण हटाने, ठेलों को व्यवस्थित स्थान देने तथा बसों के रुकने और यात्रियों के इंतजार के लिए पर्याप्त जगह सुनिश्चित करने की जरूरत है। नियमित निगरानी और कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले समय में बसों की संख्या भले बढ़ जाए, लेकिन यात्रियों की परेशानी कम नहीं होगी। सवाल सीधा है— जब बसें इलेक्ट्रिक होकर शहर को नई रफ्तार दे रही हैं, तो उनके स्टॉप कब अतिक्रमण से बाहर निकलकर उसी रफ्तार के साथ चलेंगे
