भोपाल। शादी के बाद घर-गृहस्थी ही उनकी पूरी दुनिया थी। उनके पति चाहते थे कि उनकी पत्नी भी कुछ सीखे और अपने पैरों पर खड़ी हो।पति के कहने पर राजकुमारी ने ऑटो चलाना सीखा लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
कुछ समय बाद उनके पति को कैंसर हो गया।तमाम कोशिशों के बावजूद उनके पति का निधन हो गया।अब राजकुमारी के सामने अपने दो बच्चों की जिम्मेदारी थी।ऐसे मुश्किल समय में उन्होंने हार नहीं मानी और खुद ऑटो चलाने का फैसला किया।
एक महिला का अकेले ऑटो चलाना आसान नहीं था।
लोगों की बातें और समाज का डर भी था।
लेकिन राजकुमारी ने डरना छोड़ दिया।
वह भोपाल की सड़कों पर दिनभर ऑटो चलाने लगीं और अपने बच्चों की जिम्मेदारी खुद उठाने लगीं।
जिस सेकंड हैंड ऑटो से उन्होंने शुरुआत की थी, वही उनके परिवार का सहारा बन गया।
आज लोग उन्हें “भोपाली ऑटोवाली” के नाम से जानते हैं।
राजकुमारी की कहानी सिर्फ एक महिला के ऑटो चलाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हिम्मत, मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल है।
उन्होंने साबित कर दिया कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो तो इंसान अपने परिवार के लिए कुछ भी कर सकता है।
आज उनका ऑटो ही उनके परिवार का सहारा है और उनके दोनों बच्चों की जिम्मेदारी भी वह अकेले उठा रही हैं।
