देश के कई हिस्सों में इन दिनों वायरल संक्रमण और फ्लू जैसे लक्षणों वाले मरीजों की संख्या बढऩा चिंता का विषय है. तेज बुखार, खांसी, गले में खराश, शरीर में दर्द, थकान और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षणों को सामान्य मौसमी बीमारी मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. खासकर जब कुछ मरीजों में बुखार 103 से 104 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच रहा हो, तब स्वास्थ्य तंत्र को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है. बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए संक्रमण अधिक गंभीर रूप ले सकता है. एच 1 एन 1 इन्फ्लुएंजा वायरस का एक स्ट्रेन है, जिसे आम बोलचाल में स्वाइन फ्लू कहा जाता है. हालांकि यह नाम पूरी तरह सटीक नहीं माना जाता. इन्फ्लुएंजा वायरस लगातार अपने स्वरूप में बदलाव करता रहता है. छोटे बदलावों को एंटीजेनिक ड्रिफ्ट और बड़े बदलावों को एंटीजेनिक शिफ्ट कहा जाता है. यही कारण है कि इन्फ्लुएंजा के टीके में भी समय-समय पर बदलाव किए जाते हैं, ताकि प्रचलित स्ट्रेन के खिलाफ सुरक्षा बेहतर हो सके. चिंता की एक वजह यह भी है कि इन्फ्लुएंजा और कोविड जैसे श्वसन संक्रमण के लक्षण कई बार एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं. केवल लक्षणों के आधार पर इनके बीच अंतर करना हमेशा संभव नहीं होता. ऐसे में स्वयं दवा लेने या बीमारी को मामूली समझने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक समझदारी है. गंभीर लक्षण सामने आने पर जांच और उपचार में देरी नहीं होनी चाहिए. सरकारों की जिम्मेदारी सबसे पहले यह सुनिश्चित करने की है कि अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जांच केंद्रों में पर्याप्त व्यवस्थाएं उपलब्ध रहें. स्वास्थ्य विभागों को संक्रमण की निगरानी बढ़ानी चाहिए और जहां मामलों में वृद्धि हो रही है, वहां समय रहते एडवाइजरी जारी करनी चाहिए. अस्पतालों में ऑक्सीजन, आवश्यक दवाओं और जांच सुविधाओं की उपलब्धता की नियमित समीक्षा भी जरूरी है. साथ ही, लोगों को बीमारी के लक्षण, बचाव और उपचार को लेकर सही जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति न बने. लेकिन केवल सरकारों के भरोसे इस संक्रमण का मुकाबला नहीं किया जा सकता. जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. बुखार, खांसी या फ्लू जैसे लक्षण होने पर भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचना, जरूरत पडऩे पर मास्क का उपयोग करना, हाथों की स्वच्छता बनाए रखना और पर्याप्त आराम करना जरूरी है. बीमार व्यक्ति को दूसरों से दूरी रखनी चाहिए, विशेषकर घर में बुजुर्गों और छोटे बच्चों से. दरअसल,सरकारी स्वास्थ्य विभागों की ओर से जारी हिदायतों का पालन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक या अन्य दवाओं का सेवन नहीं किया जाना चाहिए. टीकाकरण को लेकर विशेषज्ञों की सलाह को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए.फिलहाल घबराने की नहीं, जागरूक रहने की जरूरत है. सरकारें निगरानी और उपचार व्यवस्था मजबूत करें तथा जनता सावधानी और जिम्मेदारी का परिचय दे. संक्रमण की रोकथाम में छोटी-सी लापरवाही भी बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है. इसलिए सतर्कता, स्वच्छता और समय पर चिकित्सा सलाह ही एच 1एन 1 सहित अन्य श्वसन संक्रमणों से बचाव की सबसे मजबूत ढाल है.
