सूखे से निपटने के लिए सक्रिय और तकनीक आधारित क्षमता विकसित करे दुनिया : भूपेंद्र यादव

नयी दिल्ली, 25 अगस्त (वार्ता) केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सूखे से निपटने के लिए सक्रिय और प्रौद्योगिकी आधारित क्षमता विकसित करने का आह्वान किया है। मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (यूएनसीसीडी) के सीओपी17 में ‘सूखे से निपटने की क्षमता में तेजी लाना’ विषय पर श्री यादव ने कहा कि सूखा अब कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, खाद्य प्रणालियों, जैव विविधता और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने वाली निर्णायक चुनौती है।

उन्होंने कहा कि सूखे को बार-बार आने वाली आपदा के रूप में देखने के बजाय पूर्वानुमानित और रोकथाम योग्य जोखिम के तौर पर प्रबंधित करने की जरूरत है। उन्होंने भारत के समन्वित और बहु-संस्थागत दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि देश में प्रारंभिक चेतावनी, शमन, राहत और सामुदायिक सुदृढ़ता पर एक साथ काम किया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री ने भूमि और जल के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए कहा, “प्रवाह से पहले वनों का पुनर्स्थापन करें।” उन्होंने कहा कि भारत में जलग्रहण क्षेत्रों और नदी क्षेत्रों में वनीकरण, नदियों के पुनर्जीवन तथा पारंपरिक जल निकायों के पुनरुद्धार जैसे कदम जल सुरक्षा और सूखे से निपटने की क्षमता को मजबूत कर रहे हैं।

उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों के सामुदायिक नेतृत्व में किए जा रहे पुनरुद्धार कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मैदानी क्षेत्रों में अखिल भारतीय जलसंभर कार्यक्रम के माध्यम से पहाड़ी से घाटी तक वर्षाजल के संरक्षण और भूमि क्षरण को रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं। इन पहलों में सामुदायिक संस्थाओं और ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों की भी भागीदारी है। पेयजल कार्यक्रमों के माध्यम से सूखे जैसी परिस्थितियों में घरेलू स्तर पर विश्वसनीय जल आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है।

श्री यादव ने फसल बीमा को भी सूखे से निपटने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि फसल बीमा किसानों को फसल चक्र के दौरान सूखे और अन्य प्राकृतिक जोखिमों से होने वाले नुकसान से सुरक्षा प्रदान करता है। रियायती प्रीमियम के साथ प्रौद्योगिकी आधारित आकलन को जोड़कर दावों के त्वरित और पारदर्शी निपटान का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सामुदायिक स्वामित्व, क्षमता निर्माण और आजीविका में विविधता लाना प्रतिक्रियात्मक राहत से आगे बढ़कर सक्रिय और तकनीक-सक्षम सूखा प्रबंधन के लिए जरूरी है।

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