यह मानवता की सामूहिक पराजय

110 दिनों तक चले ईरान-अमेरिका संघर्ष का अंत आखिरकार शांति समझौते के रूप में सामने आया है. जिनेवा में दोनों पक्ष वार्ता की मेज पर लौट आए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह शांति वास्तव में जीत है ? जब किसी युद्ध की समाप्ति 7,500 से अधिक मौतों, लाखों लोगों के विस्थापन और लगभग 162 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक तबाही के बाद होती है, तब इतिहास इसे किसी पक्ष की विजय नहीं, बल्कि मानवता की सामूहिक पराजय के रूप में दर्ज करता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध में चार बड़े लक्ष्य लेकर प्रवेश किया था,ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, तेहरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना, क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना और पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत करना. लेकिन युद्ध समाप्त होते-होते तस्वीर उलट गई. ईरान न केवल राजनीतिक रूप से अधिक संगठित होकर उभरा, बल्कि पूरे इस्लामी जगत में उसके प्रति सहानुभूति और समर्थन भी बढ़ा. जिस शासन को कमजोर करने की कोशिश की गई, वह पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है. युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों ने उठाया. हजारों परिवार उजड़ गए, अस्पताल और बुनियादी ढांचे नष्ट हुए, लाखों लोग शरणार्थी बनने को मजबूर हुए. आधुनिक युद्धों की यही सबसे बड़ी त्रासदी है कि निर्णय सत्ता के गलियारों में होते हैं, लेकिन कीमत आम जनता चुकाती है. मिसाइलें और ड्रोन किसी सैनिक और नागरिक के बीच अंतर नहीं करते. युद्ध की आग जब भडक़ती है, तो उसमें इंसानियत सबसे पहले झुलसती है.आर्थिक दृष्टि से भी यह संघर्ष विनाशकारी साबित हुआ. तेल बाजार में उथल-पुथल मची रही. क‘चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया. भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका सीधा असर पड़ा. पेट्रोल और डीजल महंगे हुए, परिवहन लागत बढ़ी और महंगाई का दबाव आम लोगों तक पहुंचा. सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश साधनों की कीमतें भी बढ़ीं. यह युद्ध केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर गया. हालांकि युद्धविराम के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है, लेकिन जो नुकसान हो चुका है उसकी भरपाई आसान नहीं होगी. युद्ध समाप्त होने के बाद भी उसके घाव वर्षों तक समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर दिखाई देते हैं. पुनर्निर्माण, पुनर्वास और विश्वास बहाली की प्रक्रिया लंबी और कठिन होती है. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित किया है कि सैन्य शक्ति किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. अंतत: वही हुआ जो शुरुआत में ही होनी चाहिए थी यानी बातचीत. यदि 110 दिन पहले संवाद का रास्ता चुना गया होता, तो हजारों जानें बच सकती थीं और अरबों डॉलर की बर्बादी रोकी जा सकती थी.आज जब दुनिया अनेक संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों से घिरी हुई है, तब ईरान-अमेरिका युद्ध का सबक स्पष्ट है. युद्ध शुरू करना आसान है, लेकिन उसके परिणामों को नियंत्रित करना असंभव. शांति केवल समझौतों से नहीं आती, बल्कि इस स्वीकारोक्ति से आती है कि किसी भी संघर्ष में सबसे मूल्यवान चीज मानव जीवन है. यदि शांति तक पहुंचने के लिए हजारों लोगों की जान चली जाए, तो वह शांति नहीं, मानवता की बहुत महंगी कीमत पर खरीदी गई मजबूरी होती है.

 

 

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