
सवाल यह है कि भारत इस फैसले को कैसे देखता है। बंगलादेश पहले ही भारत को साफ संदेश दे चुका है कि दोनों देशों के रिश्ते वैसे नहीं होंगे, जैसे वे पहले थे। अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से दोनों देशों के सामान्य रिश्तों को झटका लगा है। एक ओर जहां 1971 में बंगलादेश की आजादी के साथ शुरू हुई दोस्ती को झटका लगा, वहीं मोहम्मद यूनुस के हाथ में बंगलादेश की कमान आने के बाद भी रिश्ते बिगड़ते चले गये। श्री यूनुस ने सत्ता हाथ में आने के बाद न सिर्फ भारत-विरोधी दांव खेला, बल्कि दोनों देशों के बीच आग में घी डालने का भी काम किया। उन्होंने कथित रूप से बंगलादेश में लोगों को भारत के खिलाफ भड़काया और ‘सात बहनों’ (पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों) के बारे में भी भड़काऊ टिप्पणियां कीं। भारत ने इन बयानों की सनद ली और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे खूब कवरेज दी।
श्री यूनुस के चले जाने और श्री रहमान के सत्ता में आने के बाद भी बंगलादेश में भारत-विरोधी प्रचार नहीं रुका है, भले ही यह कम हो गया हो। बंगलादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन ने भारत-विरोधी मत बरकरार रखा है। दोनों समूहों के पाकिस्तान और चीन से अच्छे संबंध हैं। वे श्री रहमान के भारत दौरे का विरोध कर रहे हैं और इसके साथ कुछ शर्तें जोड़ दी हैं। इन मांगों के कारण बंगलादेश सरकार भी दबाव में आ गयी है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में प्रमुख विपक्षी दल बने जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान हितैषी माना जाता है। पार्टी ने 1971 में बंगलादेश की स्थापना का विरोध किया था और अविभाजित पाकिस्तान की वकालत की थी। पार्टी अब भी 1971 में बंगलादेश की आजादी पर भारत के रुख को स्वीकार नहीं कर पायी है।
जमात के दो प्रवक्ता बैरिस्टर फुआद और बैरिस्टर शहरयार खुले तौर पर भारत-विरोधी बयान दे चुके हैं। बंगलादेश में इस समय 211 ऐसे संस्थान, पार्टी और संगठन मौजूद हैं जो भारत-विरोधी पक्ष रखते हैं और भारत-विरोधी अभियान में भी शामिल हैं। बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के सत्ता में आने के बाद तारिक रहमान की सरकार ने भारत से रिश्ते बनाने की कोशिश की है। दोनों देशों के बीच की दूरियां खत्म करने और द्विपक्षीय मतभेदों को सुलझाने के प्रस्ताव भी मेज़ पर रखे गये हैं। इसके बावजूद श्री रहमान की पार्टी एवं सरकार अवामी लीग के साथ भारत के अच्छे रिश्तों और इस दौरान बीएनपी की कथित अवहेलना को भुलाने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में कई लोगों का मानना है कि श्री रहमान का भारत दौरा कई गिरहों को खोलने में अहम साबित होगा। एक देश अपने दोस्त बदल सकता है, लेकिन पड़ोसी नहीं। भूराजनीति की दुनिया में दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरत है। आर्थिक और द्विपक्षीय संकट को बातचीत के बिना खत्म नहीं किया जा सकता। ऐसे में श्री रहमान के भारत दौरे पर बहुत कुछ टिका हुआ है।
इस बीच, सरकार श्री रहमान के दौरे पर भारत-विरोधी गुटों के विरोध को भी नज़रंदाज़ नहीं कर सकी है। यही वजह है कि पेश की गयी शर्तों के कारण नया बखेड़ा खड़ा हो गया है जो दोनों देशों में गलत संदेश भेज सकता है। सवाल यह है कि क्या भारत इन शर्तों को स्वीकार करेगा, और अगर हां, तो कैसे। श्री रहमान के दौरे के संबंध में भारत के सामने जो शर्तें रखी गयी हैं उनमें सबसे पहली है सुश्री हसीना का बंगलादेश लौटना। साथ ही उमर हादी की हत्या के आरोप में पश्चिम बंगाल में हिरासत में लिये गये दो आरोपियों को बंगलादेश को सौंपने की मांग भी की गयी है।
सुश्री हसीना पहले ही दिसंबर 2026 में भारत से बंगलादेश लौटने की बात कह चुकी हैं। उनके इस बयान ने बंगलादेश सरकार को अपनी रणनीति पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया है। अवामी लीग पर प्रतिबंध लगने के बावजूद बंगलादेश में सुश्री हसीना को भारी समर्थन प्राप्त है। अगर वह स्वदेश लौटती हैं तो सरकार को उन्हें सुरक्षा देनी होगी। अगर उन्हें लौटने के बाद सलाखों के पीछे डाला जाता है, तो उनके समर्थकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला और बुलंद हो जायेगा। बहरहाल, भारत-बंगलादेश रिश्तों को लेकर राजनयिकों का मानना है कि शर्तें लगाकर रिश्ते बहुत आगे तक नहीं जा सकते। बातचीत और दोस्ती के जरिए कई मतभेद सुलझाए जा सकते हैं। बंगलादेश ने हाल ही में अपने तेल संकट से निपटने के लिए भारत से अतिरिक्त डीजल मांगा है। आने वाली बैठक में गंगा जल संधि का मुद्दा भी उठ सकता है, तो 30 साल पूरे होने पर समाप्ति के करीब है।
