भोपाल। आजादी से पहले सवाल था भारत कब आजाद होगा? आजादी के बाद सवाल बदल गया भारत को आगे कैसे ले जाया जाए? और मध्यप्रदेश के विस्तार के साथ एक और सवाल जुड़ा हर शहर, हर गांव और हर नागरिक की आवाज लोकतंत्र तक कैसे पहुंचे?
जबलपुर में न्याय की आवाज। भोपाल में शासन और राजनीति की आवाज। इंदौर में व्यापार और उद्योग की आवाज। ग्वालियर में इतिहास और बदलते समाज की आवाज। सतना में विंध्य की आवाज। और छिंदवाड़ा में आदिवासी, ग्रामीण और उभरते मध्यप्रदेश की आवाज।
इन अलग-अलग आवाजों को एक साथ रखने की कोशिश ही नवभारत की विस्तार यात्रा की सबसे बड़ी पहचान बनी। इस प्रकार 1934 में निकली एक आवाज आजादी की लड़ाई से गुजरते हुए आजाद भारत के निर्माण की साक्षी बनी।
फिर वह आवाज नागपुर की सीमाओं से बाहर निकल कर जबलपुर में पहुंची। भोपाल की राजधानी से जुड़ी। इंदौर के बाजारों तक गई। ग्वालियर के किले की छाया में पहुंची। सतना के विंध्य को आवाज दी। और छिंदवाड़ा की पहाड़ियों तक जा पहुंची।
यह केवल एक समाचार पत्र के संस्करणों की कहानी नहीं है। यह मध्यप्रदेश के बदलते भूगोल, बदलते समाज और बदलती आकांक्षाओं के साथ चलती पत्रकारिता की कहानी है। क्योंकि शहर बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, तकनीक बदलती रही, समय बदलता रहा, लेकिन एक चीज लगातार बनी रही खबर को समाज तक पहुंचाने की जिम्मेदारी।
