इंदौर: दुनिया में सबसे बड़ा धर्म प्रकृति है. ऐसा कोई समाज और धर्म नहीं, जिसका प्रकृति से कोई वास्ता नहीं हो. प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह किसी भी धर्म और समाज का हो, हवा, पानी, मिटटी, जंगल और प्रकृति का साथ चाहिए. सबसे बड़ा धर्म प्रकृति ही होना चाहिए लेकिन दुनिया के अनेक देशों ने अपने-अपने ढंग से प्रकृति की परिभाषाएँ बना ली है. हमें आज भी पता नहीं है कि हम किस मौसम में जी रहे हैं. फरवरी गर्म हो गई है और हिमाचल प्रदेश में भी मई-जून में मौसम का मिजाज बदल गया है. इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं. यदि प्रकृति की नाराजी का समाधान खोजना है तो अगल-बगल नहीं, अपने अंदर ही झांककर खोजना होगा.ॉ
देश के प्रमुख प्रख्यात पर्यावरणविद, हरित कार्यकर्ता और हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने शुक्रवार को साउथ तुकोगंज स्थित होटल कलिंगा के सभागृह में संस्था सेवा सुरभि के तत्वावधान में क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से विषय पर आयोजित चिंतन और मंथन के दौरान उक्त बातें कही. प्रारम्भ में संस्था सेवा सुरभि की ओर से ओमप्रकाश नरेडा, मोहन अग्रवाल, डॉ. दिलीप वाघेला, किशोर पंवार और प्रेस क्लब की ओर से मुकेश तिवारी ने डॉ. जोशी का स्वागत किया. चर्चा में सांसद शंकर लालवानी, शहर काजी डॉ. इसरत अली, उद्योगपति वीरेन्द्र गोयल, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. भारत शर्मा भी अतिथि के रूप में शामिल हुए. डॉ. जोशी के उद्बोधन के साथ ही सभागृह में उपस्थित शहर के प्रबुद्ध और गणमान्य नागरिकों ने अनेक प्रश्न भी पूछे और प्रकृति से लेकर मौसम की बेरुखी के बारे में अनेक जानकारियां भी प्राप्त की. इस अवसर पर पर्यावरणविद ओपी जोशी, अतुल शेठ, कुमार सिद्धार्थ, पद्मश्री जनक पलटा, केट के पूर्व वैज्ञानिक निकेतन सेठी, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, डॉ. किशोर पंवार, डॉ. भोलेश्वर दुबे, डॉ. दिलीप वाघेला, पंकज कासलीवाल, कमल कलवानी सहित शहर के अनेक संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। संचालन अतुल शेठ ने किया और आभार माना अनिल त्रिवेदी ने।
