जब खेत बने पूजा स्थल: कानाखेड़ा में किसानों ने धरती, देव और बारिश के रिश्ते को किया नमन

नीमच। आधुनिकता के दौर में भी गांवों की मिट्टी से जुड़ी परंपराएं आज जीवंत हैं। इसका अनूठा उदाहरण रविवार को गांव कानाखेड़ा में देखने को मिला, जहां किसानों ने उज्जैनी पर्व पर अपने खेतों को ही आस्था का केंद्र बना दिया। ग्रामीण परिवार खेतों पर एकत्रित हुए और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ ग्राम देवताओं एवं इष्ट देवों की पूजा-अर्चना की।खेतों की मेड़ों पर बने अस्थायी चूल्हों पर दाल-बाटी तैयार की गई। इसके बाद नई फसल, खेती-किसानी और प्रकृति की खुशहाली के प्रतीक इस पर्व पर देवताओं को भोग अर्पित कर अच्छी वर्षा की कामना की गई। किसानों ने इंद्र देव से प्रार्थना की कि समय पर और भरपूर बारिश हो, जिससे खेतों में हरियाली छाए और अन्नदाता की मेहनत सफल हो सके।ग्रामीणों का कहना है कि उज्जैनी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और ग्रामीण जीवन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। यह परंपरा किसानों को अपनी जड़ों से जोडऩे के साथ सामूहिकता और सामाजिक एकता का संदेश भी देती है।पूजन के बाद ग्रामीणों ने सामूहिक प्रसादी ग्रहण की तथा गांव और क्षेत्र की सुख-समृद्धि के लिए मंगलकामनाएं कीं। पूरे आयोजन के दौरान धार्मिक उल्लास, पारंपरिक संस्कृति और ग्रामीण जीवन की सादगी का सुंदर संगम देखने को मिला।ग्रामीणों के अनुसार पीढिय़ों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है। बदलते समय में भी उज्जैनी पर्व गांव की सांस्कृतिक पहचान और किसानों की प्रकृति के प्रति अटूट आस्था को जीवित रखे हुए है।

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