उच्चतम न्यायालय ने सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति पर शिक्षकों को दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा का आश्वासन दिया

नयी दिल्ली, 14 जुलाई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की त्रि-भाषा नीति को लागू न करने पर यदि शिक्षकों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई की जाती है, तो वह उसमें हस्तक्षेप करेगा और उस पर रोक लगाएगा।

उल्लेखनीय है कि सीबीएसई ने चालू शैक्षणिक वर्ष से कक्षा छठी से नौवीं के छात्रों के लिए यह नीति लागू की है, लेकिन पाठ्यपुस्तकों की कमी और इस योजना को अचानक लागू किए जाने के कारण इसे लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

शिक्षकों को सुरक्षा का आश्वासन देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यदि उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू होती है, तो वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

जब पीठ को सूचित किया गया कि यदि शिक्षक नयी शुरू की गई भाषाओं को पढ़ाने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमारे पास आएं, हम बर्खास्तगी (नौकरी से निकालने) पर रोक लगा देंगे।”

अदालत ने यह आश्वासन देते हुए सीबीएसई को इस नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बोर्ड की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। पीठ ने हालांकि मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई तय की है।

सुनवाई के दौरान अलग-अलग याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं आनंद ग्रोवर, गोपाल शंकरनारायणन और मुकुल रोहतगी ने इस नीति को ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ के विपरीत बताते हुए चुनौती दी। उन्होंने पर्याप्त पाठ्यपुस्तकों और प्रशिक्षित योग्य शिक्षकों सहित शिक्षण के बुनियादी ढांचे की कमी के बीच इसे लागू किए जाने पर सवाल उठाए।

श्री ग्रोवर ने दलील दी कि सीबीएसई का सर्कुलर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुकूल नहीं है और यह छात्रों को कोई सार्थक विकल्प दिए बिना अतिरिक्त भाषा पढ़ने की शर्त थोपता है।

श्री शंकरनारायणन ने व्यावहारिक कठिनाइयों को रेखांकित करते हुए कहा कि भले ही राज्यों से एक जुलाई से इस नीति को लागू करने की उम्मीद की गई थी, लेकिन वर्तमान में संविधान की 22 अधिसूचित भाषाओं में से केवल तीन भाषाओं में ही पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि किताबों की इस कमी के कारण प्रशिक्षित शिक्षकों की भी भारी कमी पैदा हो गई है।

श्री रोहतगी ने तर्क दिया कि जो छात्र अब तक अंग्रेजी और फ्रेंच जैसे संयोजनों (कॉम्बिनेशन) की पढ़ाई कर रहे थे, उन्हें 14 वर्ष की आयु में अचानक एक और भारतीय भाषा पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि स्कूलों के पास इस नीति को लागू करने के लिए न तो आवश्यक शिक्षक हैं और न ही बुनियादी ढांचा।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि इस अधिसूचना का उद्देश्य हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक लक्ष्य को आगे बढ़ाना है।

यह संकेत देते हुए कि अधिसूचना में इस्तेमाल की गई शब्दावली पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि इसका मूल उद्देश्य स्पष्ट है। उन्होंने यह भी कहा कि सवाल अभी भी यह है कि क्या अंग्रेजी को एक मूल भारतीय भाषा माना जा सकता है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि फारसी भी कभी अदालतों की भाषा थी, लेकिन उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिली।

इन याचिकाओं में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-2023 के तहत जारी सीबीएसई के 15 मई, 2026 के सर्कुलर को चुनौती दी गई है। इस सर्कुलर में कक्षा छठी से नौवीं के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस नीति को अचानक लागू किया गया है, जिससे छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ बढ़ गया है। साथ ही यह मौजूदा भाषा संयोजनों को प्रभावित करती है और पाठ्यपुस्तकों तथा प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के साथ-साथ मूल्यांकन की स्पष्टता के अभाव से जूझ रही है।

यह मामला पहले से ही उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है। 27 मई को न्यायालय ने केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को नोटिस जारी करते हुए कहा था कि नीति को लागू करने के व्यावहारिक और लॉजिस्टिक से जुड़े पहलुओं की बारीकी से जांच करने की आवश्यकता है।

 

 

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