ऑटिज्म में सामाजिक विकास

बच्चों को सामाजिक नियम नहीं, सामाजिक समझ सिखाना

जब ऑटिज्म (Autism Spectrum Disorder – ASD) की बात होती है, तो अक्सर कहा जाता है कि “इन बच्चों में सोशल स्किल्स की कमी होती है।” लेकिन क्या वास्तव में समस्या केवल सोशल स्किल्स की होती है? शायद नहीं।

वास्तव में, अधिकांश ASD वाले बच्चे संबंध (Relationships) बनाना नहीं चाहते, ऐसा कहना सही नहीं होगा। कई बच्चे अपने तरीके से जुड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह समझने में कठिनाई होती है कि दूसरे व्यक्ति क्या सोच रहे हैं, क्या महसूस कर रहे हैं और किसी सामाजिक परिस्थिति में उनसे क्या अपेक्षा की जा रही है। इसलिए सामाजिक विकास का उद्देश्य केवल बच्चे को “Hello” बोलना या हाथ मिलाना सिखाना नहीं, बल्कि उसे लोगों को समझने और उनके साथ सार्थक संबंध बनाने में सक्षम बनाना होना चाहिए।

सामाजिक विकास में कठिनाई क्यों होती है?

सामाजिक व्यवहार कई छोटी-छोटी क्षमताओं पर आधारित होता है। यदि इनमें से किसी एक क्षेत्र में कठिनाई हो, तो उसका प्रभाव पूरे सामाजिक विकास पर दिखाई दे सकता है।

उदाहरण के लिए—

* Joint Attention: किसी वस्तु या घटना पर दूसरे व्यक्ति के साथ ध्यान साझा करना।
* Social Communication: शब्दों के साथ-साथ चेहरे के भाव, हाव-भाव, आवाज़ के उतार-चढ़ाव और शरीर की भाषा को समझना।
* Emotional Understanding: अपनी और दूसरों की भावनाओं को पहचानना और उनके अनुसार प्रतिक्रिया देना।
* Executive Functions: अपनी बारी का इंतज़ार करना, बातचीत का विषय बदलना, नियमों के अनुसार व्यवहार करना और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालना।
* Sensory Processing: तेज़ आवाज़, भीड़, रोशनी या स्पर्श जैसी संवेदी उत्तेजनाएँ कई बार बच्चे को इतना असहज कर सकती हैं कि वह सामाजिक परिस्थिति में भाग ही न ले पाए।

इसलिए किसी बच्चे का सामाजिक रूप से पीछे हटना हमेशा लोगों में रुचि की कमी का संकेत नहीं होता। कई बार वह सामाजिक परिस्थिति को समझने या उसे संभालने में कठिनाई का परिणाम होता है।

सामाजिक विकास कैसे बढ़ाया जा सकता है?

1. संबंध की शुरुआत बच्चे की रुचि से करें

शोध बताते हैं कि बच्चे सबसे अच्छी तरह तब सीखते हैं जब कोई उनकी रुचि को साझा करता है। यदि बच्चा कारों, ब्लॉक्स या जानवरों में रुचि रखता है, तो उसी गतिविधि के माध्यम से बातचीत, बारी-बारी से खेलना और साझा ध्यान विकसित किया जा सकता है। सीखना हमेशा संबंध से शुरू होता है, निर्देशों से नहीं।

2. सामाजिक कौशल को वास्तविक जीवन से जोड़ें

सामाजिक समझ केवल थेरेपी रूम में नहीं विकसित होती। भोजन के समय बातचीत करना, परिवार के साथ बोर्ड गेम खेलना, कहानी पढ़ते समय पात्रों की भावनाओं पर चर्चा करना, पार्क में दूसरे बच्चों के साथ खेलना या खरीदारी के दौरान धन्यवाद कहना—ये सभी रोज़मर्रा की परिस्थितियाँ सामाजिक सीखने के स्वाभाविक अवसर हैं।

3. पहले भावनात्मक संतुलन, फिर सामाजिक सीखना

यदि बच्चा अत्यधिक तनाव, चिंता या संवेदी अधिभार (Sensory Overload) का अनुभव कर रहा है, तो उस समय उससे सामाजिक अपेक्षाएँ रखना उचित नहीं होगा। जब बच्चा स्वयं को सुरक्षित और शांत महसूस करता है, तभी उसका मस्तिष्क नई सामाजिक जानकारी को बेहतर ढंग से ग्रहण कर पाता है। इसलिए भावनात्मक और संवेदी नियमन (Regulation) सामाजिक विकास की आधारशिला है।

4. केवल व्यवहार नहीं, सोचने का तरीका विकसित करें

यदि बच्चा यह समझने लगे कि सामने वाला व्यक्ति भी अलग सोच सकता है, अलग महसूस कर सकता है और उसकी भी अपनी इच्छाएँ हैं, तो सामाजिक व्यवहार अधिक स्वाभाविक बनने लगता है। कहानी सुनाते समय पूछें—“तुम्हारे अनुसार इस बच्चे को कैसा लगा होगा?” या “अगर तुम उसकी जगह होते तो क्या करते?” ऐसे छोटे प्रश्न सामाजिक समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5. साथियों के साथ सीखने के अवसर दें

समान आयु के बच्चों के साथ संरचित खेल (Structured Peer Play) सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे वातावरण में बच्चा साझा करना, सहयोग करना, अपनी बारी का इंतज़ार करना, समस्या का समाधान करना और छोटे-छोटे मतभेदों को संभालना सीखता है। वयस्कों की भूमिका हर समस्या का समाधान करना नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार मार्गदर्शन देना है।

6. परिवार सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

सप्ताह में कुछ घंटों की थेरेपी महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक विकास का अधिकांश भाग घर और समुदाय में होता है। जब माता-पिता, शिक्षक और थेरेपिस्ट समान लक्ष्य और समान रणनीतियों के साथ कार्य करते हैं, तो बच्चा सीखी हुई बातों को अलग-अलग परिस्थितियों में भी उपयोग करना सीखता है। यही वास्तविक सीखना है।

निष्कर्ष

ऑटिज्म में सामाजिक विकास का उद्देश्य बच्चे को किसी निश्चित सामाजिक साँचे में ढालना नहीं है। उद्देश्य यह है कि बच्चा अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों को समझ सके, अपनी भावनाएँ प्रभावी ढंग से व्यक्त कर सके और ऐसे संबंध बना सके जिनमें वह सुरक्षित, सम्मानित और स्वीकार किया हुआ महसूस करे।

याद रखें, सामाजिक विकास किसी एक तकनीक या एक थेरेपी से नहीं होता। यह हजारों छोटे-छोटे सकारात्मक अनुभवों, संवेदनशील मार्गदर्शन, सार्थक बातचीत और सहयोगपूर्ण रिश्तों से विकसित होता है। जब हम बच्चे के व्यवहार के पीछे छिपी उसकी ज़रूरतों को समझते हैं, तभी हम वास्तव में उसके सामाजिक विकास में मदद कर पाते हैं।

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मनोवैज्ञानिक डॉ. विनी झारिया

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