मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लोक सेवा गारंटी अधिनियम में किया गया नया संशोधन प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. अब यदि किसी सेवा का निर्धारित समय सीमा में निराकरण नहीं होता है, तो नागरिक के अपील करने का इंतजार नहीं किया जाएगा. समय सीमा समाप्त होने के 16 वें दिन प्रथम अपील अधिकारी स्वत: संज्ञान लेकर प्रकरण की समीक्षा करेंगे और आवश्यकता पडऩे पर संबंधित अधिकारी पर 500 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक की पेनल्टी भी लगाई जा सकेगी. यह व्यवस्था प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता दोनों को नई मजबूती प्रदान करेगी.
लोक सेवा गारंटी अधिनियम का मूल उद्देश्य नागरिकों को सरकारी सेवाएं तय समय के भीतर उपलब्ध कराना है. मध्य प्रदेश इस कानून को लागू करने वाले देश के अग्रणी राज्यों में रहा है. वर्तमान में 32 विभागों की 665 से अधिक सेवाएं इस कानून के दायरे में हैं. मूल निवास, आय और जाति प्रमाण पत्र, बिजली-पानी कनेक्शन, विभिन्न प्रकार के लाइसेंस और अन्य आवश्यक सेवाएं लाखों नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़ी हैं. इन सेवाओं में अनावश्यक विलंब न केवल लोगों की परेशानी बढ़ाता है, बल्कि शासन के प्रति विश्वास भी कमजोर करता है.
अब तक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि दरअसल,कार्रवाई तभी होती थी, जब नागरिक स्वयं अपील करता था. ग्रामीण क्षेत्रों, अशिक्षित या जागरूकता की कमी वाले अनेक लोग अपील की प्रक्रिया तक नहीं पहुंच पाते थे. इसका लाभ लापरवाह अधिकारी उठाते थे और कई मामले बिना जवाबदेही के लंबित रह जाते थे. नया संशोधन इस कमी को दूर करता है. अब अपील हो या न हो, हर विलंबित प्रकरण स्वत: समीक्षा के दायरे में आएगा. इससे अधिकारियों पर समय सीमा का पालन करने का स्वाभाविक दबाव बनेगा.
हालांकि केवल दंडात्मक प्रावधान ही पर्याप्त नहीं होंगे. सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अधिकारियों के पास आवश्यक संसाधन, पर्याप्त स्टाफ और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हों. कई बार विलंब का कारण व्यक्तिगत लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्थागत कमियां भी होती हैं. इसलिए जवाबदेही के साथ-साथ प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है.
सरकार द्वारा लोक सेवा गारंटी पोर्टल को और अधिक तकनीक-सक्षम बनाने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग की दिशा में किए जा रहे प्रयास भी स्वागत योग्य हैं. यदि एआई की सहायता से लंबित प्रकरणों की स्वत: पहचान, समीक्षा और निगरानी की व्यवस्था विकसित होती है, तो पारदर्शिता और दक्षता दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है. इससे वरिष्ठ अधिकारियों को भी वास्तविक समय में स्थिति का आकलन करने में सुविधा मिलेगी.
सुशासन केवल योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि उन्हें समय पर और प्रभावी ढंग से लागू करने से स्थापित होता है. लोक सेवा गारंटी अधिनियम में किया गया यह संशोधन प्रशासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल है. यदि इसका ईमानदारी से क्रियान्वयन हुआ, तो सरकारी कार्यालयों में अनावश्यक देरी, लालफीताशाही और नागरिकों की परेशानियां निश्चित रूप से कम होंगी.जाहिर है यही लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी कसौटी भी है कि नागरिक को उसका अधिकार समय पर और सम्मानपूर्वक प्राप्त हो.
