
जबलपुर। हाईकोर्ट के जस्टिस द्वारिकाधीश बंसल की एकलपीठ ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोर्ट का उद्देश्य तकनीकी आधार पर राहत ठुकराना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। लिहाजा, यदि किसी आवेदन में गलत कानूनी धारा का उल्लेख हो गया हो, तो महज इसी आधार पर जरूरतमंद व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि बालिग अविवाहित बेटी अपनी आय या संपत्ति से स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो वह पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार है।
न्यायालय ने *सतना* निवासी गंगा सिंह की पुनरीक्षण याचिका निरस्त करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा बेटी रक्षा सिंह के पक्ष में दो हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि फैमिली कोर्ट ने पत्नी के दावे को प्रथम दृष्टया वैध विवाह सिद्ध नहीं होने के आधार पर अस्वीकार कर दिया था। पिता ने दलील दी थी कि बालिग बेटी को धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता और उसने पिता के विरुद्ध शिकायतें भी दर्ज कराई हैं। हाईकोर्ट ने यह तर्क निरस्त करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट हिंदू दत्तक ग्रहण व भरण- पोषण अधिनियमए 1956 की धारा 20 (3) के तहत भी राहत प्रदान कर सकता है। गलत धारा का उल्लेख न्याय में बाधा नहीं बन सकता।
