
इंदौर. जिंदगीभर समाज और उद्योग जगत में अपनी पहचान बनाने वाले शहर के विख्यात उद्योगपति एवं कॉटन किंग के नाम से प्रसिद्ध कृष्णलाल चड्ढा विदा होने के बाद भी दूसरों के काम आए. उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए परिवार ने उनका देहदान कर दिया. अंगदान चिकित्सकीय कारणों से संभव नहीं हो सका, लेकिन देहदान के जरिए उन्होंने मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई और शोध के लिए अपनी अंतिम सौगात समाज को समर्पित कर दी.
5 जुलाई की रात निधन के बाद परिजनों ने सबसे पहले उनकी इच्छा पूरी करने का निर्णय लिया. मुस्कान ग्रुप की मदद से नेत्रदान, त्वचादान और देहदान की प्रक्रिया शुरू कराई गई, लेकिन सेप्टिक शॉक के कारण चिकित्सकों ने नेत्र और त्वचा दान को संभव नहीं माना. इसके बाद पुत्र राजेश चड्ढा, दामाद आशीष थम्मन और अन्य परिजनों की सहमति से पार्थिव देह शासकीय एमजीएम मेडिकल कॉलेज को सौंप दी गई. देहदान से पहले उनके निवास पर मध्य प्रदेश शासन की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर देकर सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दी गई. एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नोडल अधिकारी डॉ. राजेंद्र मार्को ने पार्थिव देह स्वीकार की. अब यह देह मेडिकल विद्यार्थियों की एनाटॉमी की पढ़ाई और शोध कार्य में उपयोगी होगी.
गीता भवन में आयोजित शोकसभा में वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. भरत रावत ने कहा कि चड्ढा परिवार का निर्णय समाज के लिए प्रेरणास्रोत है. वहीं मुस्कान ग्रुप के प्रभारी सेवादार संदीपन आर्य ने कहा कि अंगदान और देहदान किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी कई लोगों के जीवन और चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा दे सकते हैं. ज्ञात हो कि इंदौर प्रदेश में अंगदान और देहदान की अलख जगाने वाले शहरों में शामिल है. शासकीय सम्मान के साथ देहदान की व्यवस्था शुरू होने के बाद यहां 60 से अधिक लोग अपनी देह चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित कर चुके हैं. कृष्णलाल चड्ढा का देहदान इसी मानवीय परंपरा की एक और प्रेरक कड़ी बन गया.
