जी -7 शिखर सम्मेलन लंबे समय से दुनिया की सबसे प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं का मंच माना जाता रहा है. हालांकि वैश्विक व्यवस्था में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच अब यह मंच केवल विकसित देशों के हितों तक सीमित नहीं रह सकता. फ्रांस के इविया में आयोजित जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन इसी बदलती वैश्विक वास्तविकता का प्रतिबिंब था, जिसमें उन्होंने भारत के साथ-साथ पूरे ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से दुनिया के सामने रखा.आज विश्व एक साथ कई संकटों का सामना कर रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, वहीं पश्चिम एशिया के तनाव ने नई अनिश्चितताओं को जन्म दिया है. इन संघर्षों का सबसे अधिक असर उन विकासशील देशों पर पड़ता है, जो ऊर्जा, खाद्यान्न और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर हैं. ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि शांति और स्थिरता के बिना अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की कल्पना संभव नहीं है. उन्होंने बातचीत और कूटनीति को हर संघर्ष के समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम बताया. यह दृष्टिकोण भारत की उस पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जो टकराव की बजाय संवाद और सहमति पर जोर देती है.
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और देशों की संप्रभुता के सम्मान को भी वैश्विक व्यवस्था की आधारशिला बताया. वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में कई क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी हुई है, जिससे वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा है. यदि विश्व समुदाय वास्तव में स्थायी शांति चाहता है, तो उसे नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करना होगा. मोदी का यह संदेश केवल किसी एक देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए था.इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि भारत ने एक बार फिर ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से उठाया. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, गरीबी और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं. विकसित देशों की नीतियों और वैश्विक संघर्षों का प्रतिकूल प्रभाव सबसे पहले इन्हीं देशों पर पड़ता है. ऐसे में भारत का यह कहना कि दुनिया को ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं और चिंताओं को समझना होगा, समय की मांग है. भारत आज आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से उस स्थिति में है कि वह विकासशील देशों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सके.आतंकवाद के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी का रुख भी स्पष्ट और दृढ़ रहा. पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है. आतंकवाद को समर्थन देने वाले देशों के खिलाफ सख्त और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता पर उनका जोर उचित है. दुर्भाग्य से दुनिया अब भी आतंकवाद के प्रश्न पर एक समान दृष्टिकोण विकसित नहीं कर सकी है. ऐसे में भारत का यह आग्रह वैश्विक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है.यह स्पष्ट है कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श को दिशा देने वाला महत्वपूर्ण देश बन चुका है.जी-7 में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन केवल भारत की बात नहीं था, बल्कि उन करोड़ों लोगों की आवाज था जो विकास, शांति और समान अवसरों वाली विश्व व्यवस्था की अपेक्षा रखते हैं. बदलती दुनिया में यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बनकर उभर रही है.
