दो दशक पूर्व से दिया जाये आउट ऑफ टर्न प्रमोशन का लाभ  हाईकोर्ट का अहम फैसला

जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने अपने अहम आदेश में कहा है कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि प्रशासनिक फैसलों, विशेषकर जिसमें स्क्रीनिंग समिति की समझ या संतुष्टि शामिल हो उसकी न्यायिक समीक्षा की शक्ति सीमित होती है। न्यायालय प्रशासनिक संस्था के ऊपर अपीलीय अथॉरिटी के तौर पर बैठकर अपने विचार नहीं थोप सकती है। इस सीमित दायरे का मतलब यह नहीं है कि प्रशासनिक कार्रवाई न्यायिक जांच से पूरी तरह बरी है। यह बात बहुत अतार्किक और मनमानी लगती है कि प्रशासन असाधारण योग्यता के लिए टाइपिंग प्रतियोगिता जीतने को पैमाना बनाता है, फिर भी एक बड़ी आपदा को रोकने के लिए 200 फुट गहरी खाई में लटकने जैसे काम को सिर्फ रूटीन ड्यूटी कहकर खारिज कर देता है। एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को 20 साल पूर्व से आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देने के आदेश जारी किये है।

याचिकाकर्ता इंद्रमणि पटेल की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि इंदौर जिले के सिमरोल पुलिस स्टेशन में 22 अप्रैल 2004 को सब- इंस्पेक्टर एवं स्टेशन हाउस ऑफिसर के पद पर तैनात था। रात लगभग सवा 11 बजे इंदौर से लगभग 25 किलोमीटर दूर भारूघाट में ईंटों से लदा एक ट्रक अनियंत्रित होकर एक गहरी घाटी में गिर गया। ट्रक एक पेड़ के कारण रुक गया। ट्रक 200 फुट गहरी खाई के ऊपर लटक गया। सूचना मिलने पर याचिकाकर्ता तुरंत घटनास्थल पर पहुंचा और ट्रक के ड्राइवर और हेल्पर को बचाने के लिए समन्वय करने का प्रयास किया। जो बहुत खतरनाक स्थिति में थे और मदद के लिए पुकार रहे थे। जब पेशेवर क्रेन ऑपरेटरों ने खाई में नीचे उतरने से इनकार कर दिया, तो याचिकाकर्ता ने अपनी जान जोखिम में डालकर रस्सी की मदद से नीचे उतरने का फैसला किया। याचिकाकर्ता ने सफलतापूर्वक दोनों व्यक्तियों को बचाया और भारी ट्रक को मोटी रस्सियों से एक पेड़ से बांधकर सुरक्षित किया। ट्रक को और नीचे गिरने से रोककर, याचिकाकर्ता ने नीचे सड़क पर यात्रा करने वाले लोगों को संभावित नुकसान से भी बचाया।

याचिकाकर्ता को असाधारण बहादुरी के कारण स्थानीय सरपंच द्वारा सम्मानित किया गया। गणतंत्र दिवस पर इंदौर के कलेक्टर से एक शील्ड और प्रशंसा प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। असाधारण बहादुरी दिखाने के लिए याचिकाकर्ता को मध्य प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के रेगुलेशन 70-। के तहत आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन के लिए लगातार आधिकारिक सिफारिशें मिलीं। इंदौर के पुलिस अधीक्षक ने 10 फरवरी 2005 को औपचारिक रूप से पुलिस उप महानिरीक्षक को मामले की सिफारिश की। इसके बाद पुलिस उप महानिरीक्षक ने यह सिफारिश पुलिस महानिरीक्षक को भेज थी। पुलिस महानिरीक्षक ने आधिकारिक तौर पर याचिकाकर्ता के मामले को डीआईजी (सिलेक्शन) के पास भेज दिया। वरिष्ठ अधिकारियों की इन स्पष्ट सिफारिशों के बावजूद, स्क्रीनिंग कमेटी ने 31 मार्च 2005 को बिना सोचे- समझे प्रस्ताव की सिफारिश को खारिज कर दिया। इसके बजाय याचिकाकर्ता को 5,000 रुपये का नकद इनाम देने का फैसला किया। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी।

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