इबोला वायरस के खतरे को देखते हुए देश के सभी हवाई अड्डों पर अलर्ट और अफ्रीकी देशों की यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए एडवाइजरी जारी की गई है. दरअसल, कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया ने यह मान लिया था कि अब वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से अधिक सतर्क और सक्षम हो चुकी है. लेकिन अफ्रीकी देशों में इबोला वायरस के नए प्रकोप ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि संक्रामक बीमारियों के सामने मानवता की तैयारी अब भी अधूरी है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और उसके आसपास के क्षेत्रों में तेजी से फैल रहे इबोला संक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है. अब तक 670 संदिग्ध मामले और 160 संदिग्ध मौतें सामने आना इस बात का संकेत है कि स्थिति साधारण नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस गंभीरता से चेतावनी जारी की है, वह पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस बार फैल रहा ‘बुडिबुग्यों’ स्ट्रेन ऐसा वायरस है, जिसके खिलाफ अभी तक कोई प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. यानी दुनिया एक ऐसे संक्रमण से जूझ रही है, जिसका न तो तय इलाज है और न ही रोकथाम का कोई पुख्ता टीका. यही कारण है कि अफ्रीकी देशों में भय और असुरक्षा का माहौल तेजी से गहराता जा रहा है. इबोला कोई सामान्य बीमारी नहीं है. यह अत्यंत घातक संक्रमण है, जो संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने और अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है. संक्रमित वस्तुएं, शवों के संपर्क और असुरक्षित स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इसके प्रसार को और तेज कर देती हैं. तेज बुखार, उल्टी, दस्त और आंतरिक रक्तस्राव जैसे लक्षण इसे और भयावह बनाते हैं. ऐसे में यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह केवल अफ्रीका तक सीमित रहने वाला संकट नहीं होगा.
दुखद पहलू यह भी है कि महामारी केवल वायरस से नहीं फैलती, बल्कि लापरवाही, अंधविश्वास और अव्यवस्था भी उसे खतरनाक बना देते हैं. कई क्षेत्रों में लोगों द्वारा इलाज केंद्रों पर हमले और चिकित्सा शिविरों को जलाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं. यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ्य संकट केवल वैज्ञानिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है. जब जनता का भरोसा टूटता है, तब बीमारी और तेजी से फैलती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह शिकायत भी उचित है कि दुनिया की प्राथमिकताएं अक्सर राजनीतिक और आर्थिक हितों के अनुसार तय होती हैं. विकसित देशों में फैलने वाले वायरस वैश्विक सुर्खियां बन जाते हैं, जबकि अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के संकट को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिलती. कोविड ने यह सिखाया था कि किसी भी देश की बीमारी सीमाओं में कैद नहीं रहती. आज यदि अफ्रीका में संक्रमण फैल रहा है, तो कल उसका असर एशिया और यूरोप तक पहुंच सकता है.
भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश के लिए भी यह चेतावनी महत्वपूर्ण है. अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और वैश्विक संपर्क के इस दौर में स्वास्थ्य निगरानी तंत्र को और मजबूत करना होगा. एयरपोर्ट स्क्रीनिंग, संक्रमण जांच, चिकित्सा संसाधनों की तैयारी और जनजागरूकता जैसे कदम समय रहते उठाने होंगे. साथ ही, भारत को वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.
इबोला का यह नया प्रकोप केवल अफ्रीका का संकट नहीं, बल्कि पूरी मानवता की परीक्षा है. यदि दुनिया ने फिर देर की, तो इतिहास एक बार फिर वही सवाल पूछेगा कि क्या हमने महामारी से कोई सबक सीखा भी था ?
