पीएम मोदी की ‘ऊर्जा बचत और नो गोल्ड’ अपील को वैज्ञानिकों का मिला बड़ा समर्थन: देश की आर्थिकी सुधरेगी और हिमालय को मिलेगी नई संजीवनी

देहरादून | पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। इस संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ऊर्जा संसाधनों का सीमित उपयोग करने और अगले एक साल तक सोना (गोल्ड) न खरीदने की विशेष अपील की है। चूंकि ईंधन और सोने दोनों का बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है, जिसके लिए देश को कीमती विदेशी मुद्रा (डॉलर) खर्च करनी पड़ती है। पीएम की इस मुहिम से आयात में कमी आएगी, जिससे न केवल देश का राजस्व बचेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया भी मजबूत होगा।

वातावरण और पर्यावरण वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री की इस ‘नो गोल्ड, सेव एनर्जी’ अपील का पुरजोर समर्थन किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊर्जा संसाधनों और वाहनों के अत्यधिक उपयोग से निकलने वाले धुएं के कारण ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) की समस्या वैश्विक स्तर पर एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि देश की जनता स्वेच्छा से ऊर्जा की खपत को कम करती है, तो इससे कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट आएगी। यह अनुकरणीय कदम न केवल मैदानी इलाकों के पर्यावरण को शुद्ध करेगा, बल्कि बढ़ते तापमान के कारण पिघल रहे हिमालई क्षेत्रों और वहां के ग्लेशियरों के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी और रक्षा कवच साबित होगा।

वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में कोरोना काल के दौरान देश में लगे लॉकडाउन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय मानवीय और औद्योगिक गतिविधियां थमने से पर्यावरण पूरी तरह स्वतः रीसेट (स्वस्थ) हो गया था। लॉकडाउन के दौरान गंगा नदी हरिद्वार तक पूरी तरह प्रदूषण मुक्त और निर्मल हो गई थी, हवा की गुणवत्ता में ऐतिहासिक सुधार हुआ था और हिमालई क्षेत्रों में जैव विविधता को नया जीवन मिला था। विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम मोदी की इस अपील को अपनाकर हम बिना किसी पाबंदी के, स्वेच्छा से पर्यावरण को वही पुराना जीवन दे सकते हैं। देश की जनता द्वारा संसाधनों की इस किफायत को अपनाने से देश की आर्थिक सेहत मजबूत होने के साथ-साथ नाजुक हिमालई तंत्र को एक नई संजीवनी मिलना तय है।

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