चुनाव समाप्त होते ही महंगाई रूपी बुल्डोजर शुरू, हर क्षेत्र में बढ़ी महंगाई ने मध्यम वर्ग की कमर तोड दी

पन्ना :अतिक्रमण रूपी बुल्डोजर तो ऐसा है कि वह तेल से चलता है लेकिन मंहगाई रूपी बुल्डोजर बिना ईंधन के चलने वाला है जो अनवरत ही चलता रहता है और आज इस महंगाई रूपी बुल्डोजर ने मध्यम वर्ग को ऐसे मुहाने पर खडा कर दिया है कि वह चाहकर भी न मर सकता है और न जीने की तमन्ना रख सकता है। अतिक्रमण रूपी बुल्डोजर से भले ही कोई बच जाए लेकिन महंगाई रूपी बुल्डोजर की मार से कोई बचने वाला नहीं है। सरकार अपराधियों पर असली बुल्डोजर चलायेगी और किंतु जनता पर दूसरा बुल्डोजर चलेगा। वह बुल्डोजर भी चलना शुरू हो चुका है। महंगाई के रुप में वह बुल्डोजर आ चुका है और जनता उसका अनुभव भी करने लगी है चूंकि अभी कुछ प्रदेशों में चुनाव थे इसलिए वोट के लिए डीजल, पेट्रोल व रसोई गैस की कीमतों पर ठहराव सा दिखाई दे रहा था।

किंतु जैसे ही चुनाव हो गये और सरकारें बन गई तो एक बार फिर से मंहगाई को ट्रेन दौडनी शुरू हो चुकी है इसे यदि महंगाई का बुल्डोजर कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।ये पहली बानगी है आगे का भी प्रसाद मिलता रहेगाः- कुछ दिनों तक डीजल, पेट्रोल व रसोई गैस की कीमतों में विश्राम की स्थिति रहने के बाद अचानक शुरू हुआ मूल्य वृद्धि का प्रसाद मिलना शुरू हो चुका है अभी तो कथा का शुभारंभ है जिसे महंगाई का मंगलाचरण कहा जा सकता है। किंतु बात यहीं से समाप्त होने वाली नहीं है क्योंकि जनता पर चलने वाला महंगाई का बुलडोजर कुछ इस तरह से आगे बढेगा जैसे किसी मेढक को पानी भरे पात्र में रखकर नीचे धीमी गति से आग जलाई जाये। ऐसी स्थिति में मेढक को गर्मी भी महसूस नहीं होगी और वह उस आग की ताप से राख भी जायेगा। जनता पर चलने वाला महंगाई का बुल्डोजर इसी तरह से चलेगा।
बाहर का ड्रामा कुछ और होगाः- बाहर की दुनिया जो दृश्य माध्यम में परोसा जायेगा वह कुछ और होगा। उसे देखने के बाद कई लोगों को शायद इस महंगाई का दर्द भी महसूस न हो। इसलिए तरह तरह की विषयवस्तु के साथ कई तरह की पटकथाओं का मंचन सियासत के माध्यम से होता रहेगा। किंतु जनता सियासत की उस चक्की में इस तरह से पिसती रहेगी कि उसे पता नहीं चलेगा कि कब उसकी पिसाई हो गई क्योंकि जनता उसे समझना भी नहीं चाहती। वह महंगाई, महंगाइ तो चिल्ला सकती है किंतु इस महंगाई के पीछे चलने वाली सियासत व सत्ता का खेल क्या है इसे समझना बहुत कठिन है इसलिए उसे इतना ही नहीं समझना पर्याप्त है कि यह महंगाई अब इतनी खतरनाक स्थिति में जा रही है कि जीवन यापन करना कठिन हो जायेगा।

कई क्षेत्रों में पडता है असरः- जब डीजल, पेट्रोल एवं सिलेण्डरों की कीमतों मे इजाफा होता है तो उसका असर केवल दो पहिया या चार पहिया चलाने वालों तक नहीं होता बल्कि व्यापक पैमाने पर पडता है एक किसान भी प्रभावित होता है जब उसके खेत की जुताई व बुवाई में ट्रेक्टर वाला रेट बढा देता है परिवहन में भी असर होता है क्योंकि बहुत सारा माल परिवहन के माध्यम से पहुंचता है ऐसी स्थिति भाडा महंगा होगा तो वस्तु ओं की कीमतो में भी वृद्धि होती है। खाद्य सामग्री हो अथवा अन्य कोई सामग्री हो सभी की कीमतों में उछाल शुरू हो जाता है यात्री बसों के संचालक भी मांग शुरू कर देते हैं और स्वीकृति के पहले ही किराये भी वृद्धि कर देते हैं। ऑटो वाहनों के रेट बढ जाते हैं इसलिए डीजल, पेट्रोल की मूल्य वृद्धि से पडने वाले दुष्प्रभावों को यदि समझना है तो उसकी व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए। एक आम नागरिक तो केवल मछली की तरह तडप सकता है और उसकी आवाज भी आगे नहीं बढ सकती। किंतु धरती में ऐसे भी लोग हैं, संगठन हैं, दल हैं जो सामूहिक रुप से इस महंगाई पर आवाज उठा सकते हैं।

ये बिना तेल वाला बुल्डोजर हैः- अपराधियों पर चलने वाला बुल्डोजर तो तेल से चलने वाला है लिहाजा उसकी तो सीमा हो सकती है किंतु जनता पर चलने वाला महंगाई का बुलडोजर ऐसा है जो बिना तेल से चलेगा। उसकी कोई सीमा नहीं है वह अंतिम छोर में खडे व्यक्ति को भी अपने शिकंजे में लपेट सकता है। इसलिए बिना तेल वाले बुल्डोजर का असर एक आमजन पर भी पडेगा। इसलिए ऐसे बुल्डोजर को रोकना होगा। इस तरह के बुल्डोजर को रोकने के लिए जनता की आवाज ही काम आ सकती है किंतु वह आवाज यदि धीरे धीरे गरम हो रहे पानी में बैठे मेढक जैसी होगी तो फिर कुछ भी समझ में आने वाला नहीं है।

बुल्डोजर बाबा हो, मामा हों या नाना से जनता करे सवालः- जनता पर चलने वाले बिना तेल वाले बुल्डोजर से निजात कब मिलेगा इसका जबाव भी उन्हीं नायकों से लिया जाना चाहिए जो तेलवाला बुलडोजर चलवा कोई बुल्डोजर बाबा बन जाता है, कोई मामा बन जाता और कोई नाना। जनता को महंगाई से राहत चाहिए। जिसके लिए एक कदम भी कोई कोशिश नहीं होती। मूल्यिवृद्धि को रोकने के लिए कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं हो पाया जो निगरानी कर सके और रोजमर्रा होने वाली मूल्यवृद्धि की समीक्षा कर सके। मनमाने तरीके से रेट बढ रहे हैं आम जनता की पीडा समझने की कोई कोशिश ही नहीं हो रही है। बावजूद इसके लोग इतने भ्रमित है कि उनके समझ में ही कुछ नहीं आ रहा है।

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