उज्जैन: नीलगंगा क्षेत्र में कवेलू कारखाना चलता था, जो बंद हो चुका है. इस परिसर में करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीन आज भी वीरान पड़ी है.16 फरवरी 2021 को नगर निगम और जिला प्रशासन ने यहां बड़े स्तर पर कार्रवाई करते हुए करीब 7.19 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया था. उस समय 150 से अधिक अवैध मकान हटाए गए थे और घोषणा की गई थी कि यहां ‘सु-राज कॉलोनी’ के तहत ईडब्ल्यूएस श्रेणी के करीब 220 मकान 35.82 करोड़ की लागत से बनाए जाएंगे.
फाइलों में कैद योजना
पांच साल बाद भी योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई. 1.52 हेक्टेयर भूमि पर कॉलोनी निर्माण का प्रजेंटेशन भोपाल तक पहुंचा, फिर भी शासन से मंजूरी नहीं मिली. नतीजा आज यह जमीन खाली पड़ी है और शाम होते ही यहां असामाजिक गतिविधियां व शराबखोरी शुरू हो जाती है.
लोकेशन प्राइम, उपयोग शून्य
यह जमीन नीलगंगा से हरिफाटक मार्ग तक फैली हुई है. आसपास रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और महाकाल मंदिर जैसे प्रमुख स्थान मात्र 1 किमी की दूरी पर हैं. सीवरेज, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं पहले से मौजूद हैं, फिर भी विकास का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
पहले बेचने की तैयारी
करीब 3.27 हेक्टेयर जमीन को निजी हाथों में बेचने की तैयारी भी पहले की गई थी, बावजूद वह योजना भी आगे नहीं बढ़ सकी. वर्तमान में जमीन की कीमत करोड़ों में पहुंच चुकी है, बावजूद इसके उपयोग को लेकर असमंजस बना हुआ है.
व्यावसायिक उपयोग की सोचो
महाकाल मंदिर के नजदीक होने के कारण यह जमीन व्यावसायिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. यहां बहुउद्देशीय कॉम्प्लेक्स, मार्केट या पार्किंग विकसित की जाए तो न केवल शहर को आय होगी, बल्कि स्थानीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा. श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी खरीदारी व घूमने के लिए बेहतर विकल्प मिल सकता है.
सिंहस्थ से पहले योजना जरूरी
शहर में सिंहस्थ की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में इस जमीन का उपयोग अस्थायी बस स्टैंड या मल्टी लेवल पार्किंग के रूप में भी किया जा सकता है. फिलहाल नगर निगम, जिला प्रशासन और विकास प्राधिकरण के बीच स्पष्ट निर्णय नहीं होने से यह जमीन उपेक्षा का शिकार बनी हुई है.
अधिकारी यहां क्यों नहीं जाते
संभागायुक्त आशीष सिंह, कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, नगर निगम आयुक्त अभिलाष मिश्रा और विकास प्राधिकरण के सीईओ संदीप सोनी से अपेक्षा है कि वे स्थल का निरीक्षण कर जल्द कोई ठोस योजना तैयार करें. वरना सिंहस्थ तक यह बेशकीमती जमीन यूं ही वीरान पड़ी रहेगी और शाम ढलते ही ‘मयखाना’ बनती रहेगी.
नगर निगम को दी जा चुकी जमीन
चर्चा जरूर हुई थी उज्जैन विकास प्राधिकरण को यह जमीन देने के लिए ताकि यहां पर कोई योजना बनाई जा सके. बावजूद इसके जब अतिक्रमण हटाने के बाद प्रक्रिया शुरू की गई तो यह जमीन कुछ वर्ष पहले ही नगर निगम को दी जा चुकी है, वह कुछ योजना यहां पर बना रहे हैं.
– संदीप सोनी ,सीईओ ,विकास प्राधिकरण उज्जैन
