टोक्यो, 20 अप्रैल (वार्ता) जापान सरकार ने पूर्वी चीन सागर में नये ढांचे निर्माण करने की चीन की कोशिशों पर सोमवार को कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
दोनों एशियाई देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच यह नया विवाद सामने आया है।
जापान के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, चीन पिछले कुछ वर्षों से पूर्वी चीन सागर में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए गतिविधियों में तेज़ी ला रहा है। जापान ने पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच की भौगोलिक मध्य रेखा (इक्विडिस्टेंस लाइन) के चीनी हिस्से में अब तक कुल 23 ढांचे बनाए जा चुके हैं। हाल ही में जापान ने इसी क्षेत्र के पश्चिमी हिस्से में चीन द्वारा एक नया ढांचा स्थापित करने की गतिविधि की पहचान की है।
जापान का कहना है कि यह बेहद खेदजनक है कि चीन इस क्षेत्र में एकतरफा विकास कार्य जारी रखे हुए है। गौरतलब है कि पूर्वी चीन सागर में ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ ( ईईजेड़) और महाद्वीपीय शेल्फ की सीमाओं का अभी तक पूरी तरह निर्धारण नहीं हुआ है। जापान का तर्क है कि समुद्री सीमाओं का फैसला दोनों देशों के बीच की समान दूरी वाली भौगोलिक रेखा के आधार पर होना चाहिए।
इस मामले में जापानी विदेश मंत्रालय के एशियाई और ओशिनिया मामलों के ब्यूरो के महानिदेशक कनाई मासाकी ने चीनी दूतावास के उप मिशन प्रमुख शी योंग को तलब किया। उन्होंने चीनी कार्रवाई के खिलाफ कड़ा विरोध जताते हुए चीन से ‘जून 2008 के समझौते’ को लागू करने पर बातचीत फिर से शुरू करने का आग्रह किया। इस समझौते के तहत दोनों देश पूर्वी चीन सागर में संसाधनों के विकास के लिए सहयोग करने पर सहमत हुए थे।
जापान और चीन के बीच पिछले कुछ महीनों से रिश्ते काफी तनावपूर्ण बने हुए हैं। पिछले साल नवंबर में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने कहा था कि ताइवान पर चीनी हमला जापान के लिए सेना तैनात करने का कानूनी आधार बन सकता है। इसके जवाब में चीन ने व्यापारिक प्रतिबंध लगाए और जापान पर ‘सैन्यवाद’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
हाल ही में, चीन ने ताइवान जलडमरूमध्य में जापानी युद्धपोत की मौजूदगी को उकसावे वाली कार्रवाई बताया था और जवाब में पश्चिमी प्रशांत महासागर में अपने युद्धपोतों को युद्धाभ्यास के लिए तैनात कर दिया था। यह तनाव तब और बढ़ गया है जब जापान पहली बार फिलीपींस में अमेरिकी सेना के साथ बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास में शामिल हो रहा है।
