
सिलवानी। क्षेत्र में फसलों की कटाई के बाद खेतों में बची नरवाई जलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। जबकि प्रशासन द्वारा इस पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया है, इसके बावजूद रात के समय कई जगहों पर खेतों से उठती आग की लपटें साफ देखी जा सकती हैं।
नरवाई में लगाई जा रही आग हवा के साथ फैलकर आसपास के खेतों के लिए भी खतरा बन रही है। चिंगारियां दूर-दूर तक उड़कर सूखी खड़ी फसलों को अपनी चपेट में ले सकती हैं, जिससे आगजनी की घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है। वहीं, इससे निकलने वाला धुआं और कालिख आसपास के घरों तक पहुंचकर लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नरवाई जलाने से भूमि की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे मिट्टी के पोषक तत्व और लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यदि नरवाई को जलाने के बजाय खेत में ही मिलाया जाए तो यह प्राकृतिक खाद का काम करती है और भूमि की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है।
इसके बावजूद अधिकांश किसान समय और मेहनत बचाने के लिए नरवाई में आग लगा रहे हैं, ताकि जल्द से जल्द ग्रीष्मकालीन फसलों की बोवनी की जा सके। नगर एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों ऐसे दृश्य आम हो गए हैं।
भूसे का भी बढ़ रहा संकट
हार्वेस्टर से कटाई बढ़ने के कारण पशुओं के लिए भूसे की कमी गहराती जा रही है। ऊपर से खेतों में बची नरवाई को भी जला देने से पशुओं को उपलब्ध चारा पूरी तरह खत्म हो रहा है, जिससे पशुपालकों की चिंता बढ़ गई है।
कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन को इस पर सख्ती से अमल कराते हुए नरवाई जलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि संभावित आगजनी और पर्यावरणीय नुकसान को रोका जा सके।
