​प्रार्थना से बीमारी ठीक होने का झांसा: मोहनपुर खुर्द में धर्मांतरण के गंभीर आरोप

गुना। जिला मुख्यालय से महज 22 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम मोहनपुर खुर्द में रविवार को ईस्टर के नाम पर एक बड़ा आयोजन किया गया, जिसमें धर्मांतरण और अंधविश्वास के गंभीर आरोप सामने आए हैं। यहाँ लगभग 300 से 400 गरीब आदिवासियों को एकत्रित कर सामूहिक भोज दिया गया और “प्रार्थना से बीमारी ठीक होने” जैसे दावों के जरिए उन्हें एक नए प्रकार के पाखंड की ओर धकेला जा रहा है।

गाँव की जमीनी हकीकत बताती है कि जहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है, वहाँ मिशनरी तंत्र सक्रिय हो गया है। मेहंदी बाई और रुकमणी जैसी महिलाओं ने बताया कि झाड़-फूंक से आराम न मिलने पर उन्हें “यीशु की चंगाई” का रास्ता दिखाया गया। गंभीर रूप से बीमार लोगों को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय उन्हें केवल प्रार्थना के भरोसे छोड़ दिया गया। ज्ञान सिंह, जिनके हाथ-पैर सूख रहे थे, और एक्सीडेंट की शिकार गीता बाई को चिकित्सा के बजाय केवल धार्मिक प्रार्थनाओं का झांसा दिया गया, जो सीधे तौर पर एक बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

कानून से बचने के लिए रटाई गई भाषा

आयोजन के संचालक उत्तम ने इसे “मन परिवर्तन” करार दिया, जबकि ग्रामीण महिलाएं इसे “परमेश्वर का पुत्र” बता रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यप्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम की कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए ग्रामीणों को यह विशिष्ट भाषा सोच-समझकर रटाई गई है। स्थानीय युवक विशाल, जिसने दतिया के मिशनरी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की है, अब गाँव-गाँव जाकर इन वचनों को फैलाने का कार्य कर रहा है, जो एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि 20 साल पहले यहाँ ऐसी गतिविधियाँ नहीं थीं। अब बकरे और मुर्गों के भोज के प्रलोभन के जरिए आदिवासियों को इकट्ठा किया जाता है। आरोप है कि विदेशी धन और सुनियोजित मिशनरी रणनीति के तहत स्थानीय युवाओं को तैयार कर उन्हीं के समाज की पारंपरिक पहचान और आस्था को बदलने का काम किया जा रहा है।

शासन और प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

जिला मुख्यालय के इतने करीब खुलेआम सैकड़ों आदिवासियों को प्रलोभन देकर और अंधविश्वास फैलाकर यह खेल चल रहा है, लेकिन प्रशासन मौन बना हुआ है। मध्यप्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत प्रलोभन देकर धर्मांतरण एक दंडनीय अपराध है। ऐसे में एसडीएम, तहसीलदार और स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक शासन स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं इन क्षेत्रों में नहीं पहुँचाता, तब तक मजबूर आदिवासी इसी तरह मिशनरी तंत्र का शिकार होते रहेंगे।

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